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Showing posts from 2018

मुद्दा नहीं है अंधेरा

मुद्दा अब अंधेरा नहीं कहीं नहीं है अंधेरा डूबता नहीं है सूरज अब कभी कहीं रात आती होगी शायद नींद में और शाम तो जैसे सदी का सबसे बड़ा झूठ अन्यथा हुआ ही रहता है सबेरा ...

खिलना भूल जाने के पहले

खिलना भूल जाने के पहले … ढूंढ़ो, ढूंढ़ो और ढूंढ़ो कहां हूं मैं अगर नहीं हूँ जमीन में, आकाश में पानी में, हवा - बतास में आग में या वहाँ  इडेन  के बाग में, पहाड़ में, जंगल क...

मुक्ति - पर्व

मुक्ति - पर्व जो फूल तोड़ते हैं वे तोड़ते हैं सपने मरोड़ते हैं संभावनाएं मारते हैं जीवन हत्यारे हैं वे मनुष्यता के असंख्य बीज के ! वे जानते हैं फिर भी तोड़ते हैं फूल ...

घर

घर मत पूछो कब लौटता हूं घर कोई उत्तर नहीं है मेरे पास लेकिन चलता हूं रोज घर की ओर सोचकर कि कभी तो पा जाऊंगा इस रास्ते का वह छोर जहाँ होगा मेरा घर खड़ा मेरी प्रतीक्षा ...

अपना अपना भाग

अपना – अपना भाग देख लिया हमने चुआकर पसीना, बहाकर खून आंसू पी – पीकर देख लिया हमने जीकर अलग-अलग व्यवस्था में बदली गई व्यवस्था हमारे नाम पर हमारे लिए बाद में व्यवस्था हमें बद...

क्रिसमस कविता

क्रिसमस कविता ---------------------- इलाका रेतीला और पथरीला चल रही होगी ठंढी हवा दिवस बंज़र रातें बांझ गुमसुम सुबह उतरने नहीं देती होगी कोई गीत किसी की आवाज़ में कहीं कोई चिड़िया - चुनमुन नह...

कविता / 34 / सुनो , कौशिकी !

     १. चला आया हूँ  दूर   तुमसे बहुत दूर लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें कभी भी भूला नहीं बस आ गई है  एक दूरी  - भर पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से बीच मेरे और तेरे बह रही अनवरत स्मृतियाँ उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है बिलकुल ताजा, साफ - शीतल रोज आ मैं थका - हारा नहाता हूं उसमें धोता हूं सभी कपड़े उतार उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में फिर उन्हें सुखाता हूं रोज नदी से बाहर आ वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं पकड़ वही कच्ची पगडंडियां निकल तपती रेत से जो छूट जातीं आगे कहीं जातीं खो किसी महामार्ग में शहर की ओर और फिर खो जाता हूँ आगे कहीं भीड़ में मैं भी एक सामान्य आदमी -सा और जहां से लौट आना बिलकुल होता है असंभव... लेकिन सच कहूं ऐ कौशिकी ! तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं कहीं तो खूब भीतर कोई अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे महसूस होता अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण जीवनी - शक्ति के टकराते ही रहते हैं मेरी उत्तप्त दीवारों से बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहत...

दीवार

दीवार के साथ जीने की सदियों लंबी आदत, परंपरा बन जाती है बिल्कुल दीवार - सी ही ठोस और खड़ी हमें जीना पड़ता है इन्हीं दो दीवारों के बीच हमेशा दीवार हमारे बीच रहती है  और हम दीवारों के बीच हम  हम तोड़े जाते हैं समय - समय पर  टूटते जाते हैं हम  दीवारें नहीं हम कुछ बरस जीते हैं  दीवारें जीती हैं सदियां, सहस्राब्दियां...

कविता / / दिन

वही पहला दिन था इस पृथ्वी का जब उठा था धुआँ  नीचे चूल्हे से घास - फूस की छप्पर के ऊपर और पकी थी पहली रोटी ! और दूसरा दिन ? वह आजतक आया नहीं  हां, घोषणा हुई अवश्य बार - बार कि अभी आ गया है वह सपनों में काग़ज़ों पर उतारना है उसे  फिर आना ही उसे जमीन पर आखिर कागजों से जमीन की दूरी ही क्या है ! ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है ! जमीन पर ही उगते हैं पेड़ पेड़ से बनते कागज कागज पर उतरते कुछ सपने सपनों में दिखता वह दिन  वह दिन उतरेगा इसी पृथ्वी पर ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है !

कविता / 33 / जीवन ऐसा ही रहता है !

आश्रय का झूठा आश्वासन जैसे एक जर्जर छप्पर टंगा रहता बोये गए सपनों के कूट - स्तंभों पर कभी नहीं बनता वह पक्की छत सिर्फ इसकी लालसा या आस  तनी रहती है आस - पास या सिर के ऊपर आजीवन बारिश हो या तेज हवा करीब - करीब असंभव होता है बचना और दोपहर को उसके अनगिन सूक्ष्म छिद्रों से जब धूप नीचे गिरती है तो छांह में भी छेद है, स्पष्ट दिखता है ! इसी को कोई नियति लिखता है या कोई कहता है ज्यादा सोचो मत, जीवन ऐसा ही रहता है ! ---08/08/2018

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले

कविता / 31 / कम हो जाता है शहर

जैसे मापा जा सकता है मनुष्य को भीतर से वैसे ही इस शहर को इसके ऊपर से ! इसलिए वह थकी चिड़िया बिजली - खंभे के हिलते तार पर सुस्ताती, उदास किंचित् भयभीत है । वह उदास है कि शहर का क्षेत्रफल जितना बढ़ता है रोज उतना ही कम हो जाता है शहर और सिकुड़ जाता है उतना ही यहाँ लोगों का भीतरी आयतन वह भयभीत है कि खो रही है रास्ते की लंबाई सड़कों की बढ़ती चौड़ाई में चौड़ाते नाले में परछाई बढ़ रही है नगरपालिका के सफाईकर्मियों की डूब रहा है शायद सूरज इस शहर का और इसलिए वह चिड़िया आशंकित उड़ गयी है पेड़ की तलाश में और रह गया है वहाँ हिलता वह बिजली - तार नंगा पूरे शहर को देने के लिए रोशनी की सांत्वना या आश्वासन  ! ----6 अगस्त  2018, गोवा।

गजल / 41 / खबर है सारे सितारे

खबर  है  सारे  सितारे  कल  जमीं  पर आएंगे। आसमां वे  लौटकर  वापस  नहीं  फिर जाएंगे।। आसमां में नफरतों की  आग कब की बुझ गई हम जमीवाले ,  न जाने , होश में  कब आएंगे। रोशनी की  आहटें  जो सुन  अभी - भी सो रहे वक्त पे  सूरज  कभी   पहचान  वे  क्या पाएंगे ? फूल पत्थर पे चढ़ा  हासिल हुआ है क्या कभी   फूल पर अब  पत्थरों को  हम चढ़ाकर आएंगे। जिंदगी -भर  खाक छानी  सोचकर ये ही सदा खाक से  निकले  हुए हैंं  खाक में मिल जाएंगे। 2122. 2122. 2122 . 212 1st August 2018.

गजल / 40 / आखिरी सीढ़ी पकड़

आखिरी  सीढ़ी पकड़  वो जो खड़ा है आदमी। देखता है  किस  तरह  छोटा - बड़ा है आदमी।। खाक से बाहर निकल वो आएगा वापस कभी ख्वाहिशों  की  कब्र  मेें  जिंदा  गड़ा है आदमी। फिक्र उनको है मकां  या बस्तियां खाली न हो देखता   कोई    नहीं    खाली  पड़ा है आदमी। ---31/07/2018, गोवा। 2122 2122 2122 212

गज़ल / 39 / कसक दिल में

कसक दिल में रह गयी थी जो  सदी से  शूल बनकर। आ  रही   बाहर  अभी   वह  खूबसूरत  फूल बनकर। इश्क  का  आईन  तो  था  एक  -सा  सबके  लिए ही सिर्फ  इंसां  ही  खड़ा  क्यों   कटघरे  में  भूल बनकर। सूंघकर   देखो   हवा  यह   लाएगी   तूफान  भी  क्या या  सदा  अफवाह   बस  आती   रहेगी   धूल बनकर। 'दर्श'   ऐसे    ही   नहीं  दरिया   रहा   बहता    हमेशा खूब  तूने  था   संभाला   अंत  तक   दो  कूल बनकर। 2122. 2122. 2122  2122

कविता / 30 / बोलना मत बाद में ।

बोलना मत बाद में कि बताई नहीं मैंने भी वह बात तुम्हें जो पहले कभी किसी ने कही नहीं कि अस्थि - कंकाल में रहती नहीं मुस्कुराहट कभी और इसलिए इतिहास कभी वह दे नहीं सकता तुम्हें जबकि मुस्कुराहट मनुष्य की सबसे बड़ी जरूरत है लेकिन इसे लाएं कहां से खींच यह तय करना या ढूंढना तुम्हें है क्योंकि पाना तुम्हें है इसलिए मैं बताऊंगा नहीं कि किधर जाना है या कि कितना दूर अन्यथा खोज नहीं शुरू होगा द्वंद्व या युद्ध एक दूसरे के विरुद्ध व्यक्तिगत या सामूहिक एक चुटकी मुस्कुराहट के लिए ! बोलना मत बाद में कि बताया नहीं मैंने कि बदल गई हैं बच्चों की स्कूली प्रार्थनाएँ उनके शब्द , उनकी पुकार , कामनाएं या अभीष्ट क्योंकि अब बदल गए हैं उनके ईष्ट नया है सिलेबस समय का बिल्कुल स्कूल यूनिफॉर्म , पानी का बोतल , यहाँ तक कि पानी भी नया मुझे पता है तुम्हारा समय गया इसलिये आश्चर्य न हो तुम्हें आनेवाले उस कल पर जो बिल्कुल भिन्न होगा आज से और मुझे पता है तुम उस कल में खोजोगे अपना सारा कल बीता हुआ अजनबी होकर रहोगे खड़े हर एक चौराहे पर अपना ही शहर - गांव पूछेगा तुम्हें  परिचय या पता और तुम अ...

गज़ल / 38 / तेज धूप है

तेज  धूप  है  ठंढी  क्यों है  इस पर बहुत  विवाद है। सूर्योदय यह  देखो  मौलिक  है  या बस अनुवाद है।। झंडे  लेकर अपने - अपने   चले  गये  वे  चोटी  पर अलग-अलग उन नामों पर  क्यों घाटी में उन्माद है ? दीवारों पर दर्ज अभी -भी  कल का सारा सन्नाटा है भूल  गए  तो पढ़ लो इसको, अच्छा  है गर  याद है। सुबह - सबेरे जिस मुर्गे ने बांग भरी थी देखो जाकर कितना वह कैदी है कितना सचमुच  वह आजाद है। उजड़े ख्वाबों की  दुनिया में  इक बस्ती  ऐसी भी है जहां अभी  भी हर  घर -आंगन रौशन है, आबाद है। ---------३०/०६/२०१८ ,  गोवा ।

गजल / 37 / तंग गलियों में कहीं

तंग गलियों में कहीं खोया हुआ - सा। शहर है  जैसे  यहाँ  सोया हुआ - सा।। कौन लाएगा खबर भी होश की देखो रुख सभी का नशे में धोया हुआ - सा। ख्वाब जैसे रेत बनकर  रह गया फिर आदमी है  ख्वाब में बोया हुआ - सा। खेत बंजर था पड़ा  सुनसान वीरां में एक पुतला था खड़ा रोया हुआ - सा। जिंदगी  देती  रही  कंधा  भरोसे  का  और रिश्ता भी रहा  ढोया हुआ - सा। ------०९/०७/२०१८ , गोवा।

कविता / 29 / सोचकर कुछ और

सोचकर कुछ और वह डाल देता है मुझे बार - बार गहरे कीचड़ में और मैं धंस जाता हूं रोज जैसे कोई दलदल में आकंठ। मुस्कुराता, वह चला जाता है वापस मुड़ - मुड़कर पीछे देखते हुए मुझे आगे कहीं थोड़ी देर बाद हो जाता है ओझल रह जाती है मेरी सूजती आंखों में उसकी आकृति धुंधली हवा में डोलती सिहर उठता है शरीर जकड़ा हुआ कीचड़ में अकड़ा हुआ आकंठ रात - भर... और सुबह वापस आकर वह देखता है आश्चर्यित आंखों से - मेरा मुखड़ा आज भी खिल गया है कीचड़ की गंदली सतह पर जैसे कोई ताजा कमल उसे नहीं मालूम  शायद रहस्य गंदले कीचड़ में है या या उसे आकंठ सहने में अन्यथा वह कभी नहीं डालता कीचड़ मुझपर और मैं नहीं धंसता कभी और न ही खिलता मैं कभी कमल बनकर भी और इसके लिए जब मैंने कहा -धन्यवाद वह भी कीचड़ में उतर आया साह्लाद !        ---०६/०७/२०१८

कविता / 28 / कुछ पता नहीं चलता

कुछ पता नहीं चलता कब सुबह हुई , दोपहर भी कब या कि शाम काम ही काम बस दिवस - भर...और दिवस बीत जाता है । कुछ पता नहीं चलता क्या गया भीतर कितना और कितना निकल गया कुछ इन आती-जाती सांसों के साथ यंत्रवत् जीवन - भर ...और हर एक पल लगता रीत जाता है । कुछ पता नहीं चलता अक्सर असत्य ही होता मज़बूत बहुत बार तो हारता है सत्य ही भले ही अंत में  एक बार जीत जाता है।  ----  ०३/०७/ २०१८

कविता / 27/ अब नहीं सुनी जाएगी

अब नहीं सुनी जाएगी कोई प्रार्थना कल ही हुई है घोषणा आकाश में कुपित सूरज लाल दिन भर कहता रहा जागकर तारे भी भाग - भागकर चांद सारी रात ... अब नहीं सुनी जाएगी प्रार्थना क्यों न हो गीली कितनी भी शब्द भी हों  मुखर कितने ही या लिए हों  बूंद - बूंद भाव करुण - आर्द्र प्रवाह कितना भी हो उसमें हाहाकार अंतस का या सांस को बिंधती कोई लंबी कराह क्यों न हो बड़ा सा दैन्य या शून्य आँखों में मौन भी हो क्यों न गहरा या प्रगाढ़ प्रार्थनाओं में या हो आँसुओं की बाढ़ कोई फर्क नहीं अब रहेगा नीला आकाश सूखा ही सदा क्योंकि सुनी नहीं जाएगी प्रार्थना कल यही घोषणा हुई है। इसलिए अब आज से होगी इसी पृथ्वी को संबोधित प्रार्थना हर एक होकर नतमस्तक  या दंडवत... रहेंगे सब मौन या चुपचाप और स्वीकार हो जाएगी हरेक प्रार्थना जिसे आज तक उठना या उड़ाना पड़ता था हमेशा ऊपर ऊंचा बादलों के पार ऊपर खिंचती जाती थी सारी डोर टकटकी लगाए सभी देखते थे ऊपर की ओर बिछौने पर चित- लेटा हाथ - पैर फेंकता एक नन्हा शिशु भी जैसे छत की ओर... सबके पैरों या जड़ों के नीचे धरती के भीतर क्योंकि सदा एक स्त्री ब...

कविता / 26 / सिर्फ इसी दिन के लिए

छुपाये अपनी मुट्ठियों में कुछ स्वयं को सबसे बचाए वह निकल आया है भीड़ से चुपचाप शायद उसे पता था भीड़ में भविष्य इन बीज का ! इन्हें अभी नहीं बहुत बाद में बोएगा वह तब जब नहीं रहेगी शेष कहीं नमी, हवा या मिट्टी नहीं रहेंगे पेड़ ये या वे पत्ते जिनपर विष्ठा के सफेद -सूखे दाग बताते हैं कि जारी है अभी -भी ... जुगलबंदी जड़ - चेतन की । बहुत बाद में बोएगा वह तब जब सब कुछ हो जाएगा जीवाश्म नीचे खूब भीतर भयावह सन्नाटा -सा उभर आएगा गोल सुदूर पूरब में ऊपर और मध्य में यह सभ्यता लटकी रहेगी निष्प्राण उस कंकाल -सी खोखली जिसकी अस्थियों में भी कहीं दबा होगा खूब गहरा घना अहंकार किसी सिकंदर या चंगेज का जो अब बाहर निकल आता है संगठित हो चढ़ नीति -नियमों के वातानुकूलित यान में अब वह देखता है है अभी भी शेष कितना अयस्क इस खदान में सर पर असंख्य अंधे सींग रक्त में कब से रहे हैं भींग भोग के हैं आसुरी ये दांत सर्वग्रासी आंत कुछ छोड़ेगी नहीं कल के लिए ... इसलिए वह भीड़ से  निकल आया है   मुट्ठियों में बचा कुछ बीज हजार सालों बाद भी जब कभी  बच्चे खड़े रहेंगे खुली धूप या बारिश म...

कविता / 25 / ठंडी हवा

सिर पर लिए वह धुंध कोहरे के घने बादल ओढ़ कंबल अस्पष्टता के खूब मोटे आ रही ठंडी हवा फिर  बंद खिड़की और दरवाज़े कहीं भी थोड़ा अगर है छेद पतला - सा सी -सी कर घुस ही जाती घर - घर फैल जाती भी सब तरफ बाहर और अंदर भी महकता तरलोष्ण कुछ - कुछ आत्मा - सा जम गया लगता हजारों मील तक भीतर बर्फ का विस्तार ठंडा और गहरा बंद सारे रास्ते , अदिश खड़े सभी ठंढा हृदय ले और ठंडी आंत भूख - प्यास , सपने रुके सिर्फ खटखटाते दांत... सब कुछ हो रहा जैसे जड़ीभूत... तितली सिकुड़कर जिजीविषा की ढूंढती है सुबह से ही एक छोटा गरम कोना... सर्वत्र इगलू -से सभी घर -मकान खड़े हैं प्रार्थना की पंक्ति में हे प्रभो ! कब छंटेगा धुंध ठंडा अस्पष्टता कब दूर होगी संक्रमण की पिघलेगी कब बर्फ , कब खुलेंगे रास्ते कब खुलेगा फिर वही आकाश नीला -साफ बिल्कुल स्वच्छ कब उड़ेंगे झुंड में फिर कई पंछी सांझ तक वे थके - ठंडे लौट भी आएं सुरक्षित अपने-अपने गरम घोंसले में हे प्रभो ! बस इतना बता दो कब धूप होगी कर लेंगे हम सभी प्रतीक्षा लंबी ही सही लेकिन अनिश्चित हो यह हमें अब है नहीं स्वीकार यह हमारी प्रार्थना है बस ...

कविता / 24 / क्षमा याचना

शोक - सभा नहीं पीढ़ी की विराट सभा है ये उच्च महामार्ग के नीचे दोनों ओर असंख्य लोग  घुटनों के बल खड़े ,  जोड़े हाथ,  दाँतों में दबाए  क्षमा - याचना स्तोत्र अनगिन जोड़ी आँखें मुखर जैसे करुण -कातर  स्वर रहे फूट... क्षमा करना, पुरखो ! हम तुम्हारे वंशज तो हैं गर्व है हमें हमारे कल पर जब थे तुम कभी विश्वगुरू और यहाँ हर घर के मस्तूल पर उड़ - उड़ आती थी सोने की चिड़िया विश्व के कोने-कोने से आ सभी ढूंढते थे तुम्हारे श्रीचरण सिर झुका वे धन्य होते थे कभी मगर क्षमा करना, पुरखो ! हमारे गर्व - गुब्बारे में  आज रह - रहकर चुभ जाती है एक पतली सुई हजार नोकोंवाली आत्मग्लानि की और हम  खड़े हैं यहाँ उस के नीचे किनारे हम नहीं इस लायक कि चल सकें उस पर और इसलिए खाली पड़ा है ...खाली.. यह  उच्च महामार्ग   चलकर बना गए जो तुम निराहार - निर्भय दृढ़संकल्प हे परम पुरखो ! बरसों वन-प्रांतर-गुहा में बैठ निकले थे तुम  बार - बार उस वृहत्तर - महत्तर जीवन की ओर एक लघुयान से अनंत अन्तर्यात्रा पर और स्वपात्र भर-भर लाए थे तुम वहां से झरते अमृत और...

कविता / 34 / सुनो, कौशिकी !

     १. चला आया हूँ  दूर   तुमसे बहुत दूर लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें कभी भी भूला नहीं बस आ गई है  एक दूरी  - भर पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से बीच मेरे और तेरे बह रही अनवरत स्मृतियाँ उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है बिलकुल ताजा, साफ - शीतल रोज आ मैं थका - हारा नहाता हूं उसमें धोता हूं सभी कपड़े उतार उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में फिर उन्हें सुखाता हूं रोज नदी से बाहर आ वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं पकड़ वही कच्ची पगडंडियां निकल तपती रेत से जो छूट जातीं आगे कहीं जातीं खो किसी महामार्ग में शहर की ओर और फिर खो जाता हूँ आगे कहीं भीड़ में मैं भी एक सामान्य आदमी -सा और जहां से लौट आना बिलकुल होता है असंभव... लेकिन सच कहूं ऐ कौशिकी ! तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं कहीं तो खूब भीतर कोई अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे महसूस होता अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण जीवनी - शक्ति के टकराते ही रहते हैं मेरी उत्तप्त दीवारों से बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहत...

कविता / 23 / उसके जाने के बाद

अभी नहीं उसके जाने के बाद आएगा सूरज भी कभी उसके सूने - अंधेरे कमरे में आग्नेय आंखें डालेगा ,  रोशनी तेज  सर्जना के हरेक पृष्ठ पर सधैर्य ढूंढेंगा सूरज पर उसके विचार कितने थे ज्वलंत उनसे उद्भूत स्वप्न में यथार्थ का कितना हिस्सा था या फिर सूरज पर लिखा ऐसे ही कोई किस्सा था देखेगा वह क्या -  कितना  झूठ - सच या गलत - सही लिखता रहा वह आमरण सूरज पर और लौट आएगा सूरज आंखें बंद कर सोचता हुआ जाएगा डूब... ठीक कल की तरह उसके जाने के बाद पीछे चला आएगा चांद साथ में सब तारे भी रात - भर ढूंढेंगे मिलकर वे पन्नों में , शब्दों - पंक्तियों के बीच अपनी-अपनी तस्वीरें उन तस्वीरों के बिल्कुल नीचले एक कोने में टिमटिमाता एक हस्ताक्षर कितना सच है या झूठ वे बताएंगे ये सब उसके जाने के बाद । भोर में आएगा मुर्गा भी गला साफ कर , टटोलकर अपना सारा अस्तित्व जोर से बांग देगा सूने कमरे में लौट ही आएगी बांग उसके मुँह में टकराकर सुषुप्त मोटी दीवारों से फिर वही बताएगा कमरे के उस  जन्तु की बांग कभी क्यों नहीं गयी बाहर...चौखट के पार उसके जीते - जी दोपहर को सूखी ...

कविता / 22 / छोटे - छोटे प्रश्न

रहती है गर्भवती बारहोमास बनते हैं रोज भ्रूण, छोटे -छोटे प्रश्न   स्वतः स्फूर्त बढ़ते हैं अंदर रोज, सदाउर्वरा जननी जिज्ञासा रोज अथक जनती है  प्रश्न संभालना उन्हें होता है मुश्किल ये बच्चे होते हैं बहुत नाजुक और बिल्कुल सच्चे और फिर मिलता कहां जवाब सच्चे प्रश्नों का बस कोई उत्तर नहीं ...देर -देर तक रंग बिरंगे सस्ते खिलौने दिये जाते हैं डाल और भूल ही जाते हैं लोग तब असली और जरूरी सवाल गोल - गोल सपनों की रोटियां गाढे आश्वासन की दाल वरना बदल ही देती है जरूरत की चाल और दिशा भी शायद जनती है तब जिज्ञासा भी सवाल सिर्फ समय की सुई और बाजार की उछाल के मुताबिक और तब सामने से... ठीक सामने क्षितिज से गायब ही हो जाता है गंतव्य रह जाते हैं पीछे सिर्फ उधार विचार - मंतव्य अपनी आत्मा के खाली हिस्से में समझ नहीं पाती तब जिज्ञासा भी कि उसके पास की कंघी अब भी है निष्ठा की  या है किसी वेश्या की !! कभी समझ नहीं पाती ! ------ ०९|०६|२०१८ , गोवा ।

कविता / 21 / जहां कहीं भी है

जहां कहीं भी है संभावना जीवन की  थोड़ी -सी भी वहां जीवन है अवश्य मोह कह लो या जीने की हूब उग ही जाती है दूब पत्थर पर भी पसार देती है  हरियाली छिटपुट  जहां कहीं मिट्टी -पानी का  स्पर्श है थोड़ा भी और है छीजती हुई भी धूप  या कंजूस हवा जड़ता तोड़  आवरण को फोड़    बीज के सहस्रार से सदा आना ही चाहता है जीवन बाहर उर्ध्व  उठना ही चाहता है रस   सदा  मूल -आधार से जहां कहीं भी संभावना के अग्नि - कण हैं बीज फूटेगा सदा , रहस्य टूटेगा उस अटूट विराट् उर्जा का उसके सघन विस्तार अनंत अंतर्व्याप्ति में ये अग्नि -कण बुझते नहीं, अथक हर एक पल उड़ते रहेंगे उस क्षितिज की ओर अनंत अनंत की  यात्रा पर.... जहां सूरज प्रकट ही है सदा इसलिये कभी नहीं  होगा खत्म  यह जीवन !                                                                    ...

कविता / 20/ मैंने देखा हिमालय

मैंने देखा हिमालय उसकी गरम कांख में दबा, धीरे-धीरे  पिघल रहा है कांख से चू रहा पानी बहुत चिकनी सड़क पर और वह आदमी फिसल रहा है गिरते हुए वह कहता है शायद समय बदल रहा है.... मैंने देखा वह बामुश्किल संभल रहा है.. ------७ जून  २०१८        वास्को द गामा, गोवा ।

कविता / 19 / कल एक नदी

कल एक नदी बहाई उसने और किनारे पर मुझे खड़ा किया आज जब उसने कहा कि मैं जिंदा हूं मैं नदी में उतरा और लगा मैं डूब रहा हूँ ... डूब... ही गया बस अब जब ऊपर उतराया नदी ने कहा -शाबाश ! तुम मरे सचमुच सफलतापूर्वक कल देखना मैं भी नहीं रहूंगी रहेगी बस मेरी पथरीली छाती उसपर पड़ा रहेगा तुम्हारा मृत शरीर तबतक जबतक कोई फिर मुझे नहीं बहाता और फिर तुम्हें खड़ा नहीं करता वहां एक किनारे पर... यही सिलसिला है खड़ा होना किनारे पर डूबना उतराना अनवरत इसलिए ऐसा किया मैंने उसने कहा ......              ७ जून २०१८

गज़ल / 36 / बंद रख कमरे

बंद रख कमरे भले ही   खिड़कियां तू  खोलके रख। अब  नयी  ताजा  हवा  भी  आएगी  ये बोलके रख।। हो  गया  पूरा जमी  का  सफर  तेरा  अब , पता है ? आसमां  का सफर  आगे,  पंख अपने  तोलके रख।  सिर्फ पानी से  भला अब  प्यास भी  बुझती कहां है इक  नयी  ही प्यास उतरी है  नया कुछ घोलके रख। बहुत  सन्नाटा  बिछा  है  आज  रिश्तों  के शहर  में पास अपने, इसलिए  कुछ  दर्द की भी ढोलकें रख। दर्श  तेरे पास वो  कुछ  है  कि   बिकता ही नहीं है जो भी  आते  इधर वे  भी  लौट जाते  मोलके रख। 2122 2122 2122 2122 -----6  जून  2018       वास्को दा गामा, गोवा ।

गज़ल / 35 / जागकर ये चांद

जागकर   ये  चांद  आखिर   रात भर  गाता रहा। राग   उसका   चांदनी  बन   सुबह तक छाता रहा।। डालकर   बारूद   कोई   पेड़   की  जड़  में  गया  उधर   पंछी,   घोंसले   में  ख्वाब  सुलगाता रहा। कामयाबी  की  कहानी    पत्थरों  पर  थी  लिखी   कौन  पढ़ता   है   उसे  बस  चूमकर  जाता  रहा। साफ दर्पण  की तरह  सच  तो दिखा था  सामने तू  सदा  ही  खूब खुद  को  मगर  धुंधलाता  रहा। आज  सड़कों  ने  वही  फिर  एक सच्चाई  कही आदमी  जो   आम  था  धक्के  यहाँ  खाता रहा। इस  तरह चलना  हमेशा  दर्श  कितना  है  सही था  नहीं  सोचा  कभी  जाना  कहां, जाता  रहा। 2122 2122 2122 212 ----  ४ जून  २०१८        वास्को ...

कविता / 18/ दो बड़ी घटनाएं

घटती हैं , रोज दो बड़ी घटनाएं रोज सुबह , सूरज का निकलना और शौच सुबह सुबह फिलहाल सूर्योदय पर सब चुप हैं और चर्चा- विमर्श अभी जारी है सिर्फ शौच पर सूरज पर सोचेंगे सब सूरज के जाने के बाद फिलहाल दिन भर उतरने दो शौच पर स्वाद -----4 जून  2018       वास्को दा गामा / गोवा ।

गज़ल / 34 / रुख हवा का

रुख   हवा  का,   समय   पर  पहचान  लेता। कामयाबी   के   सभी    गुर   जान  लेता।। अच्छे - बुरे   में  फर्क का  पक्का  पता होता इक  बार भी  दिल का  कहा  गर  मान  लेता। इतनी   बुरी  हालत  कभी   होती  नहीं  तेरी शुरू   से    थोड़ा     अगर    तू   ध्यान  देता। झोलियां ही ले खड़े   छोटी-बड़ी थे लोग जब कैसे      बराबर     बांटकर     भगवान्  देता ? प्यार जीते-जी जरा -सा और जाते वक्त कंधे, और     क्या      इंसान     को    इंसान  देता ? खुद बना सकता अगर था रास्ता खुद के लिये खामखा    क्यों    और   का   एहसान  लेता ? दर्श  कड़वी नहीं  होती गज़ल  तेरी भी कभी काढ़ा  जरा - सा   गुड़  मिलाकर   छान  लेता। -----1जून 2018,   ...

गज़ल /33 / एक दलदल में

एक दलदल में  फंसा हूं इन दिनों। और भी लगता  धंसा हूँ  इन दिनों। । हो रहा  चढ़ना - उतरना इस कदर महसूस होता  है  नशा हूं  इन दिनों। चढ़ गया सिर  कौन पागलपन मेरे बेवजह  कितना  हंसा हूं  इन दिनों । रस्सियों -सी  बांधती  हैं  कुछ  मुझे महसूस होता है  कसा हूं  इन दिनों । दर्श मुझको ढूंढ  मत  बाहर  कहीं देख रग - रग में  बसा हूँ  इन दिनों । -----३० मई २०१८       वास्को दा गामा,  गोवा ।

कविता विविध / जाग तरुण

जाग,  तरुण-  अरुण  आगे  बढ़। शय्या- शतदल अब दल, पद- तल अलस- कलश- रस छोड़, वीर चल रमणी- क्षिति- रति, यौवन -चुंबन, काम - दहन कर,  व्योमकेश बन उन्नति- गति- अति दृढमति पौरुष बाध साध, बढ़, पथ अबाध चढ़।। धर पग, हो यह हिमनग डगमग ! उठा खड्ग,   अब अंबर से लग भर   हुंकार,   रे  नव  युग  रव ! गूंजे,   जन - मन  में  स्तव  तव करे   नमन   निखिल   भूमंडल, साकार ब्रह्म !नव इला-कला गढ़। जाग,   तरुण -अरुण आगे  बढ़।।  ----1990, भागलपुर । 28 साल पहले की रचना मेरे छात्र जीवन काल की है...शायद अब की दौर में किसी काम की नहीं । लेकिन अजायबघर में लोग अभी भी जाते हैं ...

गज़ल / 32 / भाव भी उठते नहीं

भाव भी उठते नहीं अब  शब्द भी चुप हो गए। सो   गया  संवाद  जैसे   अर्थ  भी चुप हो गए।। आंख  के  आगे   अंधेरा  और  गहरा  हो गया वक्त भी बहरा हुआ फिर  दर्द भी चुप  हो गए। शब्द को आवाज मिलती फूंक से भी आपकी आपसे  उम्मीद  थी  तो आप  भी चुप हो गए। अपहरण  कैसे हुआ  अधिकार का, पूछा गया पक्ष की तो  बात क्या  विपक्ष भी चुप हो  गए। बोलते थे जख्म जबतक  गीत भी आता गया गीत अब आता नहीं है  जख्म भी चुप हो गए। दर्श  गज़लों में दिया  क्यूं  प्रश्न का उत्तर उन्हें नाम लेते ही  गज़ल का  लोग भी  चुप हो गए। ---30 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा ।

गज़ल 31 / हाथ ने

हाथ ने  रोजगार  मांगा  थमा  दो झाड़ू उसे। दवा भी गर मुफ्त मांगी  दो  जरा दारू उसे।। चुन सभी ने  दी अगर  सत्ता  तुम्हारे हाथ में सात फेरे मत समझना  या कि मेहरारू उसे। कैसे करे जनता तेरे  उपचार पर विश्वास भी आजतक  सबने बनाया  सिर्फ बीमारू उसे। अच्छे दिनों का स्वप्न  सीने से सटाए डोलती खूब  तूने अब  बनाया  स्वच्छ  कंगारू उसे। हवन को तैयार हालत में रहेगा देश जबतक मुद्दे  बहुत  मिलते  रहेंगे  खूब  घीढारू उसे। कहता रहेगा दर्श गज़लें सुबह होने तक यहाँ लोग कितना भी कहें मुंहफट गलाफाड़ू उसे। -----२९ मई २०१८, वास्को दा गामा, गोवा।

गजल 30 / कत्ल होता

कत्ल  होता  चौक पे सच  के  सिपाही का। उधर  गाता   राग    कातिल   बेगुनाही का।। शब्द  कल मारा गया, अब क्या  करोगे भी मौन   लेकर   चश्मदीदों   की   गवाही का ? जंगल उगाता सिर्फ चल, ये  पूछ मत कोई पर्यावरण  किसने  बिगाड़ा लोकशाही का। बहुत कोशिश  हुई  लेकिन आँकड़ों  में, है हो  न  पाया  तर्जुमा   उनकी   तबाही का। देख लेना  सरहदों पे  गांव या खाली मकां आएगा   मतलब  समझ  में  बेपनाही का। मछलियाँ छोटी मरें पर मोटियां  मस्ती करें जाल  इक  ऐसा  लगा  भी   है उगाही का। थके-प्यासे ख्वाब कोई मर नहीं जाएं कहीं पानी  पिला  दे  दर्श  तू  अपने सुराही का। ---29 मई 2018 , गोवा।