जाग, तरुण- अरुण आगे बढ़। शय्या- शतदल अब दल, पद- तल अलस- कलश- रस छोड़, वीर चल रमणी- क्षिति- रति, यौवन -चुंबन, काम - दहन कर, व्योमकेश बन उन्नति- गति- अति दृढमति पौरुष बाध साध, बढ़, पथ अबाध चढ़।। धर पग, हो यह हिमनग डगमग ! उठा खड्ग, अब अंबर से लग भर हुंकार, रे नव युग रव ! गूंजे, जन - मन में स्तव तव करे नमन निखिल भूमंडल, साकार ब्रह्म !नव इला-कला गढ़। जाग, तरुण -अरुण आगे बढ़।। ----1990, भागलपुर । 28 साल पहले की रचना मेरे छात्र जीवन काल की है...शायद अब की दौर में किसी काम की नहीं । लेकिन अजायबघर में लोग अभी भी जाते हैं ...