क्रिसमस कविता
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इलाका
रेतीला और पथरीला
चल रही होगी ठंढी हवा
दिवस बंज़र
रातें बांझ
गुमसुम सुबह
उतरने नहीं देती होगी कोई गीत
किसी की आवाज़ में
कहीं कोई चिड़िया - चुनमुन नहीं
न ही किसी हरियाली की सरसराहट
उस सर्द मौसम में
उग रही होगी उदासी बड़ी- बड़ी
भेड़ की आंखो में
भूल गए होंगे वे झुंड में
एक साथ घर का रास्ता
उड़ रही होगी गर्मी जीवन की
उनके बालों से भी
आग नहीं मिल रही होगी
चरवाहे को
लोगों में नहीं रहा होगा भरोसा
बिखर रहे होंगे शब्द प्रार्थना के
होठ तक आकर
कबीले के बनाए हुए कानून
पी रहे होंगे खून
भेड़ और चरवाहों के
दिसंबर रहा होगा देह में
आत्मा में तो होगा
वही तपता जून
भीड़ के सूने – शिथिल कंठ में
अटकी हुई होगी वह बात-
कोई तो आए
बनकर एक भोर का तारा
और एक नन्हा सूरज सुबह का
गुनगुनी धूप
दिसंबर के इस सर्द मौसम में
एक कुंवारी का मां बनना
ऐसे अनुर्वर मौसम में
कितना बड़ा उत्सव रहा होगा
जब वह नन्हा सूरज
उतरा होगा पृथ्वी पर लेकर
प्यार की गरम थपकी
करुणा का शीतल मरहम
शांति का कोमल तकिया
थके – हारे और टूटे लोग
जीवन से पस्त – त्रस्त वे
पा सके होंगे विश्रांति
भविष्य को लेकर संदेह या भ्रांति
वे कर सके होंगे दूर
मन की क्लांति
निर्दोष उजाले में फिर फूट सकी होगी
एक आत्मपूर्ण प्रार्थना
“हे प्रभो, हमारी लंबी नींद
अहंकार नहीं, नफरत नहीं, इर्ष्या नहीं, धोखा नहीं
बल्कि खुले
प्रेम के पावन ऊषाकाल में
प्रेम की पंखुड़ियों में जीवन खिले
हम प्रेम के जगत में जीवित हों
और तुम्हारा साथ
कभी न छूटे हे जीसस !
कभी मत छोड़ना मेरा हाथ !
आमेन” ।
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( मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित)
---दिलीप कुमार अर्श
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