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अपना अपना भाग


अपना – अपना भाग

देख लिया हमने
चुआकर पसीना, बहाकर खून
आंसू पी – पीकर
देख लिया हमने जीकर
अलग-अलग व्यवस्था में
बदली गई व्यवस्था हमारे नाम पर हमारे लिए
बाद में व्यवस्था हमें बदलती रही युगों तक
हर समय में हम बनते रहे
व्यवस्था की मशीन का उत्पाद
सर पर शामियाने तनते रहे
अलग-अलग रंगों के
छांह में रहकर भूलते रहे धूप का स्वाद
हम भूल ही गए कि धूप का स्रोत सूरज है
सूरज और कुछ नहीं, बस आग है
वही आग जिसमें पकी थी पहली रोटी
रोटी से ही आया था सभ्यता का पहला स्वाद
स्वाद के पीछे दौड – भाग में
गोल रोटी – से बने गोल पहिए
पहिए चलते रहे
चलती रही व्यवस्था
पहिए बदलते रहे
बदलती रही व्यवस्था
नए -  नए मार्ग
हरेक मार्ग पर  फिर ढूंढ़ते रहे वही छांह ,
जहाँ सुस्ताते हम भूल ही जाते हैं
धूप, सूरज और आग
और याद रह जाता है सिर्फ
छांह का अपना – अपना भाग !

  नवंबर 2018

(सर्वाधिकार सुरक्षित)


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