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मुक्ति - पर्व

मुक्ति - पर्व
जो फूल तोड़ते हैं
वे तोड़ते हैं सपने
मरोड़ते हैं संभावनाएं
मारते हैं जीवन
हत्यारे हैं वे मनुष्यता के
असंख्य बीज के !
वे जानते हैं
फिर भी तोड़ते हैं फूल
और चढ़ाते हैं समाधि पर
कि खुश होगा इसके भीतर का देवता
और देगा आशीर्वाद
“फूलो- फलो”
दूर खड़ा पौधा डरा – डरा
खिला लेता है फूल
और कई गुने हजार
वे कितना भी तोड़ें
नहीं खत्म होंगे फूल
शेष ही रहेंगे बीज
कभी तो थकेंगी उंगलियां हत्यारिन
कभी तो जागेगा वह देवता
टूटते फूलों की चीख - पुकार 
चीर ही देगी एक दिन
समाधि पर जमे पथरीले सन्नाटे को
और उस दिन
आकाश भी बरसाएगा फूल
धरती के इन फूलों के मुक्ति – पर्व पर ! □□□









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