मुद्दा अब अंधेरा नहीं
कहीं नहीं है अंधेरा
डूबता नहीं है सूरज अब
कभी कहीं
रात आती होगी शायद नींद में
और शाम तो जैसे
सदी का सबसे बड़ा झूठ
अन्यथा हुआ ही रहता है सबेरा
चढ़ी ही रहती है धूप।
सूखा आसमान
सूखे कंठ में
अटका हुआ है गान।
मुद्दा अब अंधेरा नहीं
बल्कि सुखाड़ है
इस समय
मेरी धरती का असली धोखा -
नकली बाढ़ है
रेत के बिछौने पर लेटी नदियों की !
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---दिलीप कुमार अर्श
14/12/2018
मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले
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