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मुद्दा नहीं है अंधेरा


मुद्दा अब अंधेरा नहीं

कहीं नहीं है अंधेरा
डूबता नहीं है सूरज अब
कभी कहीं
रात आती होगी शायद नींद में
और शाम तो जैसे
सदी का सबसे बड़ा झूठ
अन्यथा हुआ ही रहता है सबेरा
चढ़ी ही रहती है धूप।
सूखा आसमान
सूखे कंठ में
अटका हुआ है गान।
मुद्दा अब अंधेरा नहीं
बल्कि सुखाड़ है
इस समय
मेरी धरती का असली धोखा -
नकली बाढ़ है
रेत के बिछौने पर लेटी नदियों की !
□□□
---दिलीप कुमार अर्श
14/12/2018






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