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कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे


मुझे मत बनाओ
अतीत का अग्रज
न ही भ्रूण भविष्य का
मुझे रहने दो बस
सहोदर वर्तमान का
क्योंकि मुझे देखना है
अभी और केवल अभी का जीवन
और उसे जीना है अभी और अभी ही
फिर अभी ही बताना है
कि जीना ही बदलना है दरअसल
बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से
न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से
बदलता है जीवन !

न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से
न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से
जीवन बदलेगा
सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से ।
यह बताना है अभी मुझे
सोने से पहले











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