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कविता / 33 / जीवन ऐसा ही रहता है !


आश्रय का झूठा आश्वासन
जैसे एक जर्जर छप्पर
टंगा रहता बोये गए सपनों के कूट - स्तंभों पर
कभी नहीं बनता वह पक्की छत
सिर्फ इसकी लालसा या आस 
तनी रहती है आस - पास
या सिर के ऊपर आजीवन

बारिश हो या तेज हवा
करीब - करीब असंभव होता है बचना
और दोपहर को उसके अनगिन सूक्ष्म छिद्रों से
जब धूप नीचे गिरती है
तो छांह में भी छेद है, स्पष्ट दिखता है !
इसी को कोई नियति लिखता है
या कोई कहता है
ज्यादा सोचो मत, जीवन ऐसा ही रहता है !

---08/08/2018



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