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कविता / 31 / कम हो जाता है शहर


जैसे मापा जा सकता है
मनुष्य को भीतर से
वैसे ही इस शहर को इसके ऊपर से !

इसलिए वह थकी चिड़िया
बिजली - खंभे के हिलते तार पर सुस्ताती,
उदास किंचित् भयभीत है ।

वह उदास है
कि शहर का क्षेत्रफल जितना बढ़ता है रोज
उतना ही कम हो जाता है शहर
और सिकुड़ जाता है उतना ही यहाँ
लोगों का भीतरी आयतन

वह भयभीत है कि
खो रही है रास्ते की लंबाई
सड़कों की बढ़ती चौड़ाई में
चौड़ाते नाले में परछाई
बढ़ रही है
नगरपालिका के सफाईकर्मियों की
डूब रहा है
शायद सूरज इस शहर का
और इसलिए वह चिड़िया आशंकित
उड़ गयी है
पेड़ की तलाश में
और रह गया है वहाँ हिलता वह बिजली - तार नंगा
पूरे शहर को देने के लिए
रोशनी की सांत्वना या आश्वासन  !

----6 अगस्त  2018, गोवा।





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