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कविता / / दिन


वही पहला दिन था इस पृथ्वी का
जब उठा था धुआँ 
नीचे चूल्हे से
घास - फूस की छप्पर के ऊपर
और पकी थी पहली रोटी !

और दूसरा दिन ?
वह आजतक आया नहीं 
हां, घोषणा हुई अवश्य बार - बार
कि अभी आ गया है वह सपनों में
काग़ज़ों पर उतारना है उसे 
फिर आना ही उसे जमीन पर
आखिर कागजों से जमीन की दूरी ही क्या है !
ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है !

जमीन पर ही उगते हैं पेड़
पेड़ से बनते कागज
कागज पर उतरते कुछ सपने
सपनों में दिखता वह दिन 
वह दिन उतरेगा इसी पृथ्वी पर
ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है !





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