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कविता / 34 / सुनो, कौशिकी !


     १.
चला आया हूँ दूर 
तुमसे बहुत दूर
लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें
कभी भी भूला नहीं
बस आ गई है एक दूरी - भर
पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर
वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से
बीच मेरे और तेरे
बह रही अनवरत स्मृतियाँ
उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है
बिलकुल ताजा, साफ - शीतल
रोज आ मैं थका - हारा
नहाता हूं उसमें
धोता हूं सभी कपड़े उतार
उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में
फिर उन्हें सुखाता हूं रोज
नदी से बाहर आ
वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं
पकड़ वही कच्ची पगडंडियां
निकल तपती रेत से जो छूट जातीं
आगे कहीं जातीं खो
किसी महामार्ग में शहर की ओर
और फिर खो जाता हूँ आगे
कहीं भीड़ में मैं भी
एक सामान्य आदमी -सा
और जहां से लौट आना
बिलकुल होता है असंभव...

लेकिन सच कहूं
ऐ कौशिकी !
तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं
कहीं तो खूब भीतर कोई
अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा
हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे
महसूस होता
अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण
जीवनी - शक्ति के
टकराते ही रहते हैं
मेरी उत्तप्त दीवारों से
बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहते हैं
आ जाते कभी आँखों मेें भी पानी बनकर
चूते लीलार से भी...
पसीने की बूँदें नमकीन रोज
तो लगता है जीवित हूं अभी
और जीवन्त है मेरा अतीत भी
समय ने जिसे कह दिया था मृत और
और कुछ ने बोझ भी

हो सकता है
अतीत मृत या बोझ
कभी  इतना बुद्धिवादी रहा नहीं मैं
देखा नहीं काल में कभी कोई सरल रेखा
सदा ही एक वृत्त घूमता रहा मेरे सामने
मुझे बुलाता हुआ - सा
और हमेशा पाया मैंने स्वयं को
एक गोल - पथ की यात्रा पर
केंद्र में जिसके रही तू
कील बन, ठहरी रही तू
और मैं चलता रहा
उस अनिश्चित भविष्य की ओर
आशंका और भय अज्ञात के
आते रहे थे बार -बार
आरंभ में थरथराई थीं जांघें बहुत
कांपते थे प्राण भी
पर पीछे धकेलते
अपने वर्तमान को अतीत करते हुए
जीता हुआ अतीत को भी
पुन: पुन: कई बार
जीवित करता हुआ उसे
मैं चलता रहा...

ऐ कौशिकी !
विच्छिन्न होना है नहीं आसान
उस सुदूर - साझे अतीत से
मुमकिन नहीं होना कभी भी भिन्न
उसके सतत उद्गीथ से
ठीक तेरी धार -सी
जीवन यहाँ रहता हमेशा
गतिमान अपनी सम्पूर्णता में
उत्स से सम्बद्ध रहता है सदा
अंतिम मुहाने तक
धार में यह तय नहीं होता कभी
कब कौन - सा हिस्सा होता है अतीत
रहता वर्तमान का कौन -सा या
कि भविष्य का  कौन -सा हिस्सा है अलग
बिल्कुल तय नहीं हो पाता कभी
यह पूरा प्रवाह देता दिखाई खंड - टुकड़ों में
मैं भी अगर जड़वत् खड़ा रह जाता किनारे
मैं भी वही कहता
कि जीवन है विखंडित तीन रंगों में
तीन टुकड़ों में बंटी यह धार है।

           २.

ऐ कौशिकी !
पानी बहुत है यहाँ भी
हरेक इमारत के सिर आरूढ टंकी
खुली धूप में छोटी - बड़ी
नल की धार घर में
छोटे - से स्नानगृह में
झरनों की कोमल फुहारें
खूब नहाता हूं यहाँ भी
मगर कुछ तो भीतर
खूब भीतर अनभींगा रह ही जाता
कुछ तो छूट ही जाता सूखा - सा मुझमें
खूब धुलता है पसीना
उतरती नहीं थकान या
छाती नहीं विश्रांति अंतस में
रोज बेचैनी लिए फिर
निकल पड़ता हूं बस समुंदर की ओर
लहरें व्यस्तता की खूब ऊंची और अनगिन
सैकड़ों बांहें उठाकर खींच लेतीं
किनारे से मुझे दिन - भर के लिए
और फिर हैं पटक देतीं मुझे वापस शाम तक
दूर काले कुलिश प्रस्तर - खंड पर
आह ! निर्मम चोट पर वे डाल देतीं
उर्मियां नमकीन बेहद
जीभ पर भी फैल जातीं
शायद यही है स्वाद हलचल समय का
व्यस्त जीवन का...
दिनभर कराह बजती है हृदय में
हाहाकार सारा समुंदर का समाता है
मेरे क्षुद्र आहत आयतन में
रेत गीली मुट्ठियों में
श्रमार्जित या भ्रमजनित
उपलब्धि या फिर प्राप्ति का एहसास देती
घर लौट आने तक
पता चलता नहीं
कब डूब जाता है समुंदर में
सूरज आज के दिन का
आज भी जैसे गया दिन
बिन जिये इक और...
पात्र खाली हो गया है और थोड़ा।

       ३.

जानता हूँ
तेरी कोख के जल में उगे थे
भ्रूण आदिम सभ्यता के,
कई भू - भाग में
एक साथ कई शिशु छिटककर आ गिरे थे
उठी थीं एक साथ
खिलखिलाती कई किलकारियां अदंत
अशेष लौट आई थीं पुनः
टकराकर चतुर्दिक् संभावना के व्योम से
मैं जानता हूँ
अब सहस्राब्दियों पश्चात्
वे किलकारियां बन गई हैं
सुसंगठित - दंतुरित हुंकार
जिसमें खो गई हैं
संजीवनी कल - कल नदी की
पर्वतों की पीठ से उठती हवा की थपकियां भी
कहीं सुनसान जंगल में कभी वह सरसराहट
हर्षित हरे पत्तों की एकाएक !
घिरते मेघ पर आश्वस्त खेतों की दरारों में
धड़कते बीज की चढ़ती हुई - सी  हांफ
ठिठकी घाटियों में किलकते पंछियों की गूंजती आवाज
चढ़ती रात को सतत् स्वर झींगुरों के
सुबह फिर फूल से निकले भ्रमर के तृप्त कोमल गान
कौन सुनता है ऐ कौशिकी !
और भी हैं अनसुने स्वर ,
ध्वनियां अनाविल अस्तित्व  की
आहत या अनाहत ,सब खो गईं जैसे
मीनारी उपलब्धियों के आसमानी शोर में
या कहीं विजीगिषा की परस्पर होड़ में
अब रह गया है सिर्फ बढ़ता
क्षेत्रफल लोभ - लालच का
आयतन भी  स्वार्थ  - शोषी अजगरी आंत का
बेहद उंचाई  महत्वाकांक्षा की ...निरंकुश
ये कान उंचे हो गए हैं
खूब आगे बढ़ रहे हैं
हम,  तुम्हारी संतति 
चांद -मंगल ...आदि पर जो चढ़ रहे हैं
भले ही उखड़ रहे हैं
जड़ से पेड़, पहाड़ या पैर
सभी इंतजार में हैं कि
सस्ती या सुलभ होगी कब अंतरिक्ष की सैर !
यही नहीं ऐ कौशिकी !
अगर हुई सफल सदियों बाद भी
इस संतति की महा - स्वप्नपरियोजना
कोई नानी नहीं तब,
श्रद्धांजलि देगा तुम्हें रोबोट शायद
अपनी नकियाई -  बेसुरी आवाज में
कहानियां तेरी सुनाकर
अबोध - आतुर बाल - पीढ़ी को वहाँ
उन्हें दिखलाते हुए दूर... नीला गोल - सा कुछ
उस पर उभरती पगडंडियों -सी
अर्ध- परवलयिक अनुप्रस्थ में 
खिंचती हुई - सी दूर तक पथरीली सर्पिलाकार 
शायद कंकाल नदियों के !
हजारों साल पहले उड़ गयी थीं जो कभी
भाप बनकर एकाएक
दोपहर को एक दिन
उड़ती चील ने देखा वहां था
कैसे भाप मंडराती रही मोहवश कंकाल के ऊपर
और ठठरी में कभी उतरे नहीं फिर प्राण - जल
विश्वास कर बच्चे सभी वे पूछ बैठेंगे ..
उसके बाद  ?

ऐ कौशिकी !
मैं सिहर उठता हूँ
ऐसे दिनों की कल्पना से !


                    ४.

कोई कल्पना नहीं
ये सच है ऐ कौशिकी  !
जब कभी मैं देखता हूँ
यहां भीषण ग्रीष्म में तपती पहाड़ी
और उसके सिर, 
जंगल सूखते बदरंग होते धूप में
रूखे बाल जैसे 
ऋतु - स्राव में तापित कुंवारी के,
झरते मॉनसूनी मेघ जंगल पर
नहाती बाल से वह... 
करता हुआ शीतल
मन -प्राण, अंगों को, ताप को हरता हुआ जल
उत्तप्त होकर शांत होता - सा पुनः
तब याद आती
सौ - सौ मील तक फैली
सूखती छाती
निढाल, पसरे बेबस खेत की
जेठ की पछिया हवा बेरोक
चटती नमी
धरा के होंठ पर पपड़ी उगी ज्यों प्यास संचित
ग्रीष्म -आकुल झुंड पशुओं के
उतराते - नहाते , तेरी धार में छप् -छप्
तैरते बेफिक्र चरवाहे
गाते डूबकर आकंठ
मन - प्राण शीतल तृप्त
वे लौट आते झुंड लेकर सांझ तक ।

कोई कल्पना नहीं
एक सच है ऐ कौशिकी  !
मुझे सिहरा जाता डराकर बार - बार
वह रूप,  तेरा जल -विस्तारित विराट्
हर साल देखा, बेबस और विस्मित 
ठीक अर्जुन की तरह
अब तो यहाँ से, दूरस्थ संजय की तरह
बस देख सकता हूं , जल- प्रलय -लीला तुम्हारी
पर कह नहीं सकता
कि कैसे रात को सोते, अभागे गांव वे
पूरे गायब हो जाते कहीं
अदृश्य एकाएक
और सुबह कोसों तक वहाँ 
जल का अगम विस्तार, रौद्र - मटमैला
हलचल सतह पर तैरतीं ,फूली हुईं,
बेपता लाशें दिशाहीन
अनगिन लोगों या  पशुओं  की
खुली - पथराई हुई आँखें
अभी भी ताकती हैं शून्य में ऊपर
गीध या कौए उतरते
नुकीली और भूखी चोंच उनकी नोच लेती
महाभोज से अपने-अपने हिस्से
गड़गड़ाते निर्भार होते मेघ की
सांवली और चूती छांह में
निरुपाय, भींगे खड़े, सब पेड़ -पौधे ,धान -मक्के...
सामूहिक मृत्यु को तैयार जैसे असमय
हरे साम्राज्य का निर्मूल होते देखना !
भरे आषाढ-सावन में,  ऐ कौशिकी !
कह नहीं सकता , परन्तु
कैसे भूल सकता हूँ  !
सैकड़ों जोड़ी आँखें,  मुड़ - मुड़ देखतीं ,
पीछे हज़ारों लोग बेघर 
कई दिन बिन खाए - पिए 
यथासंभव पीठ पर ढोते हुए 
बचे - खुचे घर और 
सपने कुछ अवशिष्ट चट्टानी, आँखों में--
कहीं तो दूर आगे आसरा होगा 
सुरक्षित और ऊंचा
सोचकर ये बढ़ता जा रहा है कारवां 
ऐ कौशिकी !
हर साल जातीं अनसुनी
प्रार्थनाएँ,  मनुहार 
निस्सहाय कंठों से फूटते 
वे करुण - विगलित गीत हर साल
शोकांभरी तेरी तांडवी मुद्रा, बनाकर छोड़ जाती
शाकंभरी उस गोद को वीरान या बेहाल 
फिर से हरी -आबाद करने
निकल ही आती हठी संघर्ष - शिशुओं की पुनः पीढ़ी ।

मैं पूछता हूँ , ऐ कौशिकी  !
जीवन क्यों दिया तूने ?
संतति की यह जल - परीक्षा , क्यों बार - बार  ?
इच्छा है, यदि लौटकर आऊँ कभी
वहां नंगे पैर
बलुवाही किनारे पर खड़े होकर
पूछूं प्रश्न ये निर्मम
और यदि मिल जाएं भी उत्तर
उन्हें सबको सुना जाऊं
तुझमें आत्म -लय से पहले !

----- १३ / ०६ / २०१८ से १६ / ०८/ २०१८


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