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गज़ल / 36 / बंद रख कमरे


बंद रख कमरे भले ही   खिड़कियां तू  खोलके रख।
अब  नयी  ताजा  हवा  भी  आएगी  ये बोलके रख।।

हो  गया  पूरा जमी  का  सफर  तेरा  अब , पता है ?
आसमां  का सफर  आगे,  पंख अपने  तोलके रख।

 सिर्फ पानी से  भला अब प्यास भी  बुझती कहां है
इक  नयी  ही प्यास उतरी है नया कुछ घोलके रख।

बहुत  सन्नाटा  बिछा  है  आज  रिश्तों  के शहर  में
पास अपने, इसलिए  कुछ  दर्द की भी ढोलकें रख।

दर्श  तेरे पास वो  कुछ  है  कि   बिकता ही नहीं है
जो भी  आते  इधर वे  भी  लौट जाते  मोलके रख।

2122 2122 2122 2122


-----6  जून  2018
      वास्को दा गामा, गोवा ।



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