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कविता / 22 / छोटे - छोटे प्रश्न

रहती है
गर्भवती बारहोमास
बनते हैं रोज भ्रूण,
छोटे -छोटे प्रश्न  स्वतः स्फूर्त
बढ़ते हैं अंदर रोज,

सदाउर्वरा जननी जिज्ञासा
रोज अथक
जनती है  प्रश्न
संभालना उन्हें होता है मुश्किल
ये बच्चे होते हैं बहुत नाजुक और
बिल्कुल सच्चे
और फिर मिलता कहां जवाब
सच्चे प्रश्नों का
बस कोई उत्तर नहीं ...देर -देर तक
रंग बिरंगे सस्ते खिलौने
दिये जाते हैं डाल
और भूल ही जाते हैं लोग तब
असली और जरूरी सवाल
गोल - गोल सपनों की रोटियां
गाढे आश्वासन की दाल
वरना बदल ही देती है
जरूरत की चाल
और दिशा भी शायद

जनती है तब जिज्ञासा भी सवाल
सिर्फ समय की सुई और
बाजार की उछाल के मुताबिक
और तब सामने से...
ठीक सामने क्षितिज से
गायब ही हो जाता है गंतव्य
रह जाते हैं पीछे
सिर्फ उधार विचार - मंतव्य
अपनी आत्मा के खाली हिस्से में

समझ नहीं पाती तब जिज्ञासा भी
कि उसके पास की कंघी अब भी है
निष्ठा की 
या है किसी वेश्या की !!
कभी समझ नहीं पाती !


------ ०९|०६|२०१८ , गोवा ।





















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