जागकर ये चांद आखिर रात भर गाता रहा।
राग उसका चांदनी बन सुबह तक छाता रहा।।
डालकर बारूद कोई पेड़ की जड़ में गया
उधर पंछी, घोंसले में ख्वाब सुलगाता रहा।
कामयाबी की कहानी पत्थरों पर थी लिखी
कौन पढ़ता है उसे बस चूमकर जाता रहा।
साफ दर्पण की तरह सच तो दिखा था सामने
तू सदा ही खूब खुद को मगर धुंधलाता रहा।
आज सड़कों ने वही फिर एक सच्चाई कही
आदमी जो आम था धक्के यहाँ खाता रहा।
इस तरह चलना हमेशा दर्श कितना है सही
था नहीं सोचा कभी जाना कहां, जाता रहा।
2122 2122 2122 212
---- ४ जून २०१८
वास्को द गामा, गोवा ।
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