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कविता / 26 / सिर्फ इसी दिन के लिए


छुपाये अपनी मुट्ठियों में कुछ
स्वयं को सबसे बचाए वह
निकल आया है भीड़ से चुपचाप
शायद उसे पता था
भीड़ में भविष्य इन बीज का !

इन्हें अभी नहीं
बहुत बाद में बोएगा वह तब
जब नहीं रहेगी शेष कहीं
नमी, हवा या मिट्टी
नहीं रहेंगे पेड़ ये या वे पत्ते
जिनपर विष्ठा के सफेद -सूखे दाग
बताते हैं कि जारी है अभी -भी ...
जुगलबंदी जड़ - चेतन की ।
बहुत बाद में बोएगा वह तब
जब सब कुछ हो जाएगा जीवाश्म नीचे खूब भीतर
भयावह सन्नाटा -सा उभर आएगा गोल
सुदूर पूरब में ऊपर
और मध्य में यह सभ्यता लटकी रहेगी
निष्प्राण उस कंकाल -सी
खोखली जिसकी अस्थियों में भी कहीं
दबा होगा खूब गहरा घना अहंकार
किसी सिकंदर या चंगेज का
जो अब बाहर निकल आता है
संगठित हो
चढ़ नीति -नियमों के वातानुकूलित यान में
अब वह देखता है
है अभी भी शेष कितना अयस्क इस खदान में
सर पर असंख्य अंधे सींग
रक्त में कब से रहे हैं भींग
भोग के हैं आसुरी ये दांत
सर्वग्रासी आंत
कुछ छोड़ेगी नहीं कल के लिए ...

इसलिए वह भीड़ से निकल आया है 
मुट्ठियों में बचा कुछ बीज
हजार सालों बाद भी जब कभी 
बच्चे खड़े रहेंगे खुली धूप या बारिश में 
उदास या बेचैन भूख -प्यास के मारे  
या भयभीत भी अज्ञात कल से 
और जब आगे होगा 
दिशाहीन सन्नाटा चौराहा 
जब वे समझ नहीं पाएंगे पथ -गंतव्य 
बेमतलब बड़े होकर 
उस बीती भीड़ को कोसेंगे खूब
जो खा गयी अपनी कब्र पर भी उगी हुई दूब
घृणा करेंगे जब वे अपने ही अतीत के अग्रजों से
और जब उन्हें महसूस होगा
अपनी - अपनी मुट्ठी का विराट खालीपन
आएगा वह सामने
डाल देगा बीज सारे हाथ में उनके
जो भी बचाकर साथ अपने
लाए थे उसने
निकल उस भीड़ से
सिर्फ इसी दिन के लिए ।

-----२४ जून २०१८, गोवा ।












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