सिर पर लिए वह
धुंध कोहरे के घने बादल
ओढ़ कंबल अस्पष्टता के खूब मोटे
आ रही ठंडी हवा फिर
बंद खिड़की और दरवाज़े
कहीं भी थोड़ा अगर है छेद पतला - सा
सी -सी कर घुस ही जाती घर - घर
फैल जाती भी सब तरफ बाहर और
अंदर भी महकता
तरलोष्ण कुछ - कुछ आत्मा - सा
जम गया लगता हजारों मील तक
भीतर बर्फ का विस्तार ठंडा और गहरा
बंद सारे रास्ते , अदिश खड़े सभी
ठंढा हृदय ले और ठंडी आंत
भूख - प्यास , सपने रुके
सिर्फ खटखटाते दांत...
सब कुछ हो रहा जैसे जड़ीभूत...
तितली सिकुड़कर जिजीविषा की
ढूंढती है सुबह से ही
एक छोटा गरम कोना...
सर्वत्र इगलू -से सभी घर -मकान
खड़े हैं प्रार्थना की पंक्ति में
हे प्रभो !
कब छंटेगा धुंध ठंडा
अस्पष्टता कब दूर होगी संक्रमण की
पिघलेगी कब बर्फ , कब खुलेंगे रास्ते
कब खुलेगा फिर वही आकाश
नीला -साफ बिल्कुल स्वच्छ
कब उड़ेंगे झुंड में फिर कई पंछी
सांझ तक वे थके - ठंडे लौट भी आएं
सुरक्षित अपने-अपने गरम घोंसले में
हे प्रभो ! बस इतना बता दो
कब धूप होगी
कर लेंगे हम सभी प्रतीक्षा लंबी ही सही
लेकिन अनिश्चित हो
यह हमें अब है नहीं स्वीकार
यह हमारी प्रार्थना है बस बता दो
अन्यथा है सूचना का मौलिक अधिकार
आज सबके पास
कुछ लोग कहते हैं जिसे कविता भी !
------- 17 / 06 / 2018, नई दिल्ली ।
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