Skip to main content

कविता / 23 / उसके जाने के बाद


अभी नहीं
उसके जाने के बाद
आएगा सूरज भी कभी
उसके सूने - अंधेरे कमरे में
आग्नेय आंखें डालेगा , रोशनी तेज 
सर्जना के हरेक पृष्ठ पर
सधैर्य ढूंढेंगा
सूरज पर उसके विचार कितने थे ज्वलंत
उनसे उद्भूत स्वप्न में
यथार्थ का कितना हिस्सा था
या फिर सूरज पर लिखा ऐसे ही कोई किस्सा था
देखेगा वह
क्या -  कितना  झूठ - सच या गलत - सही
लिखता रहा वह आमरण सूरज पर
और लौट आएगा सूरज
आंखें बंद कर सोचता हुआ जाएगा डूब...
ठीक कल की तरह

उसके जाने के बाद
पीछे चला आएगा चांद
साथ में सब तारे भी
रात - भर ढूंढेंगे मिलकर वे
पन्नों में , शब्दों - पंक्तियों के बीच
अपनी-अपनी तस्वीरें
उन तस्वीरों के बिल्कुल नीचले एक कोने में
टिमटिमाता एक हस्ताक्षर
कितना सच है या झूठ
वे बताएंगे ये सब
उसके जाने के बाद ।

भोर में आएगा मुर्गा भी
गला साफ कर ,
टटोलकर अपना सारा अस्तित्व
जोर से बांग देगा सूने कमरे में
लौट ही आएगी बांग उसके मुँह में
टकराकर सुषुप्त मोटी दीवारों से
फिर वही बताएगा
कमरे के उस  जन्तु की बांग
कभी क्यों नहीं गयी बाहर...चौखट के पार
उसके जीते - जी

दोपहर को
सूखी धूल में नहाकर
आएगी गोरैया भी
ढूंढने दाने
गोल- गोल अक्षरों - शब्दों में चोंच मारकर
लौट आएगी खाली पेट
तब बताएगी, उसके जाने के बाद
उसके असमय जाने का सच
जिसे वह शब्दों में लपेटकर छुपाता रहा
सुदामा -सा कुछ
संकोचपूर्वक कांख में
आजीवन

आएगा बादल भी
देखेगा वह
बैठ इस कमरे में उसने कितना पानी लिया
जल - स्त्रोतों से और
पन्ने को ठीक उतना ही भिंगोया या नहीं
या फिर  सिर्फ सफेद - बांझ भाप बन
उड़ता रहा और
बदलता रहा उन पन्नों पर
परिभाषा प्यास और बेचैनी  की,
बादल ही बताएगा
उसके जाने के बाद ।

....और अंत में
आएगी बाई भी कचरे बीननेवाली
वह खुश होगी या निराश
धूल भरी मेज या दराज देखकर
मालूम नहीं
वह कितना बता पाएगी
वे धूल -धूसरित दीमक - प्रिय पन्ने
कितने हैं उसके काम के !

-----१२ जून  २०१८ , गोवा ।

Comments

Popular posts from this blog

गज़ल 17 / क्यों नहीं आता कोई

क्यों न आता इधर  कोई  आज उसकी छांव में। सोचकर ये  मर  रहा,  बरगद  अकेला  गांव में।। बैठ  छत  पे  फिर  सुनाए  रोज  अंदेशा  कोई ढूंढता  हूं  आज  कौए , इस  शहर की कांव में। ठंड  रातों को अंगीठी , खाट  के नीचे  लगाए था  पकाता  ख्वाब   को  गरम - मीठी ताव में। फिर  लगी  थी होड़ इक  आगे  निकलने  की या  दिखे  थे  दौड़ में  या  तो  फंसे थे  दांव में। दूर  कर  देगी   मुझे   रफ्तार  तेरी  एक  दिन चाहता  जी  बांध  दूं  पत्थर ,  तुम्हारे  पांव में। एक  पुल - सा  जी  रहा  हूं,  सोचता  भी  हूँ, नदी का थोड़ा - बहुत  एहसास तो था नाव में। समय तो था साफ  गंजा सिर  हो सपाट जैसे उसपे उगाके बाल, मैं तो खो गया उलझाव में।           22 मार्च 2018       ...

गज़ल 28 / तोड़कर दीवार भी

तोड़कर   दीवार    भी  तो  देखते। आ  जरा  इस पार  भी  तो  देखते।। ख्वाब  उतरेंगे  जमी  पर  एक  दिन होश  में  इक  बार  भी  तो  देखते। यूं नहीं कहते कि  दिल को रख बड़ा प्यार   का  आकार  भी  तो  देखते। गहन  भीतर  शांति  में  जब बैठ तू उमड़ता  यह  ज्वार भी  तो  देखते। ठूंठ   पर  चिड़ियां   बनातीं  घोंसले काल   की ये  मार  भी  तो  देखते। आंत का भूगोल  जब  भी  खींच तू भूख   का  विस्तार  भी  तो  देखते। लोग   टंगे    हैं    हवा   में   यूं  नहीं कौन   है   सरकार   भी  तो  देखते। दर्श  इतने  गीत - गजलें   क्या  करो जा   कहीं   बाज़ार  भी  तो  देखते। -----24 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा । 2122...

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले