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कविता / 24 / क्षमा याचना


शोक - सभा नहीं
पीढ़ी की विराट सभा है ये
उच्च महामार्ग के नीचे दोनों ओर
असंख्य लोग घुटनों के बल खड़े , 
जोड़े हाथ, 
दाँतों में दबाए क्षमा - याचना स्तोत्र
अनगिन जोड़ी आँखें मुखर जैसे
करुण -कातर स्वर रहे फूट...

क्षमा करना, पुरखो !
हम तुम्हारे वंशज तो हैं
गर्व है हमें हमारे कल पर
जब थे तुम कभी विश्वगुरू
और यहाँ हर घर के मस्तूल पर
उड़ - उड़ आती थी सोने की चिड़िया
विश्व के कोने-कोने से
आ सभी ढूंढते थे तुम्हारे श्रीचरण
सिर झुका वे धन्य होते थे कभी
मगर क्षमा करना, पुरखो !
हमारे गर्व - गुब्बारे में  आज
रह - रहकर चुभ जाती है एक पतली सुई
हजार नोकोंवाली
आत्मग्लानि की और हम  खड़े हैं यहाँ
उस के नीचे किनारे
हम नहीं इस लायक कि चल सकें उस पर
और इसलिए खाली पड़ा है ...खाली..
यह उच्च महामार्ग 
चलकर बना गए जो तुम
निराहार - निर्भय
दृढ़संकल्प हे परम पुरखो !
बरसों वन-प्रांतर-गुहा में बैठ
निकले थे तुम  बार - बार
उस वृहत्तर - महत्तर जीवन की ओर
एक लघुयान से
अनंत अन्तर्यात्रा पर
और स्वपात्र भर-भर लाए थे तुम
वहां से झरते अमृत
और दृष्टि -शून्य में उतर आई थी
इन्द्रधनुषी ज्योति उस विराट सत्य की
जिसकी अनाहत ध्वनि -गूंज में
झंकृत हुए थे तार सारे
पार मन के
टकराया था अस्तित्व असीम
चैतन्य के साम्राज्य के बीचोंबीच
इसी महामार्ग से लौट आए थे तुम हरेक बार
नीचे किनारे खड़ी पीढ़ी दिशाहीन
घनान्धकार दिग् -दिगन्त
परस्पर टकराते प्राणी असंख्य
टटोलते हाथ एक दूसरे का
लौट आए थे उनके लिए तुम
लेकर एक महायान
उसी महामार्ग से
कहा जाता रहा जिसे मार्ग पलायन का
परम स्वार्थ या आत्म - निर्वासन का
तुम्हारे लौट आने तक.....

अब क्षमा करना,  पुरखो !
अब रह गये हैं हम सिर्फ इस लायक ही
कि बना सकें तुम्हारी मूर्तियां
कर सकें स्थापित चौक - चौराहे पर
महामार्ग के बीच कहीं - कहीं
और बगल में गाड़ सकें मील के सफेद पत्थर
कर सकें नामकरण अलग - अलग इस मार्ग का
रह गए इस लायक ही कि
तुम्हारे इस मध्य - महमार्ग से निकाल सकें हम चोर- रास्ते
वाम या दक्षिण
जो हमारे न्यस्त स्वार्थ कर सकें पूरे
चलें हम उधर ही और उतना ही
कि पूरे हों सिर्फ अपने स्वप्न सारे अधूरे
क्षमा करना , पुरखो !
पात्रता इतनी नहीं
कि चढ़ तुम्हारे इस महायान पर हम कर सकें पार
एक भी मील - पत्थर
सिर्फ जीर्णोद्धार कर इसका
रख सकें फिर वहीं महामार्ग के बीचोंबीच ...
रह गए इस लायक सिर्फ

क्षमा करना, हे पुरखो !
बिखरे तुम्हारे अंग - प्रत्यंग ,अस्थि -पंजर
थे तुम्हारे मार्ग पर
बांटे गये थे बार -बार
विरासत के दावेदारो में
आज भी हम लड़ रहे धर्म -युद्ध, जेहाद
क्रांतियां भी की हैं अनेक
खूब बहाए हैं खून और
बहाना बदस्तूर है जारी....
लाल ताजा खून के गरम झाग में
धोये सभी ने बार -बार
अपने -अपने हिस्से के तुम्हारे अंग या अस्थियां
हम रह गए सिर्फ इस लायक
जीवित बस इतने
कि बस हरेक शाम दीये दिखाकर
तुम्हारी समाधि, स्तूप या मकबरे में
हम जा सकें वापस
अपने - अपने घर।


---------16/06/2018 , वास्को दा गामा, गोवा ।



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