खिलना भूल जाने के पहले
… ढूंढ़ो, ढूंढ़ो और ढूंढ़ो
कहां हूं मैं
अगर नहीं हूँ
जमीन में, आकाश में
पानी में, हवा - बतास में
आग में या वहाँ इडेन के बाग में,
पहाड़ में, जंगल की सिमटती दहाड़ में
सफेद ठंडी बर्फ के ऊंचे विजन विस्तार में
तो कहां हूं ?
अगर नहीं हूं
सडकों पर, सपनों में, उड़ानों में
जरुरत के उठते मकानों में
सवालों के बेचैन कक्ष में
समय के धड़कते वक्ष में
बहस के पक्ष में, विपक्ष में
तुम्हारी हंसी में, रुदन में
क्रांति के पहले, क्रांति के बाद में
कहीं नहीं हूं मैं तुम्हारे युद्ध या जेहाद में
न ही शांति – प्रस्ताव में
या संधि – समझौते के रिसते घाव में
पूजा में, नमाज में
व्यक्ति में, समाज में
नहीं हूं, तो हूं कहां मैं ?
ढूंढ़ना है तो देखना है जरूरी कि
गायब हूं मैं कहां - कहां से
कहाँ - कहाँ से उठाकर
किधर - किधर किस अंधेरे कोने में
नहीं मालूम
कहाँ रख दिया गया हूं !
देखो , देखो !
क्या सचमुच तुम्हें भी नहीं मालूम ?
तुम भूल गए शायद
कितनी कठिन अनजान सदियों से
सुनसान भीषण
कितने जंगलों, पहाड़ों – घाटियों से, नदियों से
भटकते, चढ़ते- लुढ़कते, डूबते - उतराते
पहुँचे थे हम सब साथ- साथ बहुत पहले
खेत के इन मैदानों तक
फिर चिमनियों, कारखानों तक
और अब नित- नए
वैकल्पिक मनुष्यता के अद्यतन ठिकानों तक ।
भूल गए तुम शायद
वे जानवर जंगली, हिंस्र पंजे - दांत वे खतरनाक
खुले – नंगे दिन, रातें खौफनाक
हत्यारे अंधेरे हमें घेरे
उस पर गरजते मेघ, निर्मम वज्रपात,
बेचैन – बेबस हम सभी मिल ढूंढते थे
गुफा , खोह , कोटरें
हर नींद के बाद तब
रोज पेट में एक जानवर का जागना
फिर आंखों में उतर आता था खून
लाल – लाल हो जाते थे दांत और नाखून
अस्तित्व या वर्चस्व का संघर्ष बारहमासी
थकान, निराशा और उदासी
उठी थी समवेत् तब कोने - कोने से
उद्दात्त - पवित्र मन से
वह प्रार्थना पहली बार
“हे प्रभो, हमें ले चलो अंधेरे से प्रकाश की ओर”
चल पड़ा था सिलसिला
खिलखिला कर उतरती रहीं आत्माएं पवित्र
नदी – घाटियों में, रेगिस्तानों में, पहाडों में
उतरे थे वे विश्वमित्र
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अभी नहीं उतरेंगे वे
क्योंकि अभी नहीं हूं वहाँ मैं
और क्योंकि,
न तो सिर्फ़ अंधेरा बढने से,
न ही रात के चढ़ने से,
सूरज उतरता है, सूरज की चाह बढ़ने से
इसलिए ढ़ूंढ़ो कि तुम फिर मिला सको
इस चाह में मुझे
अर्थात् मन पवित्र और उद्दात्त
और खिला सको
फूल, इस रेतीले सूखे समय में
उनके खिलना भूल जाने के पहले ! □□□
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