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कविता / 30 / बोलना मत बाद में ।


बोलना मत बाद में
कि बताई नहीं मैंने भी वह बात तुम्हें
जो पहले कभी किसी ने कही नहीं
कि अस्थि - कंकाल में रहती नहीं मुस्कुराहट कभी
और इसलिए इतिहास कभी वह दे नहीं सकता तुम्हें
जबकि मुस्कुराहट मनुष्य की सबसे बड़ी जरूरत है
लेकिन इसे लाएं कहां से खींच
यह तय करना या ढूंढना तुम्हें है
क्योंकि पाना तुम्हें है
इसलिए मैं बताऊंगा नहीं कि किधर जाना है
या कि कितना दूर
अन्यथा खोज नहीं
शुरू होगा द्वंद्व या युद्ध
एक दूसरे के विरुद्ध
व्यक्तिगत या सामूहिक
एक चुटकी मुस्कुराहट के लिए !

बोलना मत बाद में
कि बताया नहीं मैंने
कि बदल गई हैं बच्चों की स्कूली प्रार्थनाएँ
उनके शब्द , उनकी पुकार , कामनाएं या अभीष्ट
क्योंकि अब बदल गए हैं उनके ईष्ट
नया है सिलेबस समय का बिल्कुल
स्कूल यूनिफॉर्म , पानी का बोतल ,
यहाँ तक कि पानी भी नया
मुझे पता है तुम्हारा समय गया
इसलिये आश्चर्य न हो तुम्हें आनेवाले उस कल पर
जो बिल्कुल भिन्न होगा आज से
और मुझे पता है तुम उस कल में
खोजोगे अपना सारा कल बीता हुआ
अजनबी होकर रहोगे खड़े हर एक चौराहे पर
अपना ही शहर - गांव पूछेगा तुम्हें  परिचय या पता
और तुम अगर दोगे भी बता
वे समझ नहीं पाएंगे
क्योंकि तुम होगे तब अपनी भाषा का अंतिम भाषी
बस देख -देख तुम्हें  वे जाएँगे
अपने - अपने घर
और तुम पहचानविहीन बेघर
शायद करोगे महसूस पहली बार
आत्महत्या भी होना चाहिए मानव - सुलभ मूल अधिकार !
इसलिए बोलना मत बाद में
कि मैंने बताया नहीं
कि शामिल कर लो उस कल को
अभी ही अपने - अपने विश - लिस्ट में ।

-----  -१४/०७/२०१८ , गोवा ।









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