कुछ पता नहीं चलता
कब सुबह हुई , दोपहर भी कब
या कि शाम
काम ही काम बस
दिवस - भर...और दिवस बीत जाता है ।
कुछ पता नहीं चलता
क्या गया भीतर कितना
और कितना निकल गया कुछ
इन आती-जाती सांसों के साथ
यंत्रवत्
जीवन - भर
...और हर एक पल लगता रीत जाता है ।
कुछ पता नहीं चलता
अक्सर असत्य ही होता मज़बूत
बहुत बार तो हारता है सत्य ही
भले ही अंत में एक बार जीत जाता है।
---- ०३/०७/ २०१८
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