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गज़ल / 38 / तेज धूप है


तेज  धूप  है  ठंढी  क्यों है  इस पर बहुत  विवाद है।
सूर्योदय यह  देखो  मौलिक  है  या बस अनुवाद है।।

झंडे  लेकर अपने - अपने   चले  गये  वे  चोटी  पर
अलग-अलग उन नामों पर  क्यों घाटी में उन्माद है ?

दीवारों पर दर्ज अभी -भी  कल का सारा सन्नाटा है
भूल  गए  तो पढ़ लो इसको, अच्छा  है गर  याद है।

सुबह - सबेरे जिस मुर्गे ने बांग भरी थी देखो जाकर
कितना वह कैदी है कितना सचमुच  वह आजाद है।

उजड़े ख्वाबों की  दुनिया में  इक बस्ती  ऐसी भी है
जहां अभी  भी हर  घर -आंगन रौशन है, आबाद है।

---------३०/०६/२०१८ ,  गोवा ।



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