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गज़ल / 39 / कसक दिल में


कसक दिल में रह गयी थी जो  सदी से  शूल बनकर।
आ  रही   बाहर  अभी   वह  खूबसूरत  फूल बनकर।

इश्क  का  आईन  तो  था  एक  -सा  सबके  लिए ही
सिर्फ  इंसां  ही  खड़ा  क्यों   कटघरे  में  भूल बनकर।

सूंघकर   देखो   हवा  यह   लाएगी   तूफान  भी  क्या
या  सदा  अफवाह   बस  आती   रहेगी   धूल बनकर।

'दर्श'   ऐसे    ही   नहीं  दरिया   रहा   बहता    हमेशा
खूब  तूने  था   संभाला   अंत  तक   दो  कूल बनकर।

2122. 2122. 2122  2122









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