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कविता / 29 / सोचकर कुछ और


सोचकर कुछ और
वह डाल देता है मुझे बार - बार गहरे कीचड़ में
और मैं धंस जाता हूं रोज
जैसे कोई दलदल में
आकंठ।

मुस्कुराता, वह चला जाता है वापस
मुड़ - मुड़कर पीछे देखते हुए मुझे
आगे कहीं थोड़ी देर बाद
हो जाता है ओझल
रह जाती है मेरी सूजती आंखों में
उसकी आकृति धुंधली
हवा में डोलती
सिहर उठता है शरीर जकड़ा हुआ
कीचड़ में अकड़ा हुआ
आकंठ रात - भर...

और सुबह वापस आकर वह देखता है
आश्चर्यित आंखों से -
मेरा मुखड़ा आज भी खिल गया है
कीचड़ की गंदली सतह पर
जैसे कोई ताजा कमल
उसे नहीं मालूम  शायद
रहस्य गंदले कीचड़ में है या
या उसे आकंठ सहने में
अन्यथा वह कभी नहीं डालता कीचड़ मुझपर
और मैं नहीं धंसता कभी
और न ही खिलता मैं कभी कमल बनकर भी

और इसके लिए जब मैंने कहा -धन्यवाद
वह भी कीचड़ में उतर आया साह्लाद !

       ---०६/०७/२०१८




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