भाव भी उठते नहीं अब शब्द भी चुप हो गए।
सो गया संवाद जैसे अर्थ भी चुप हो गए।।
आंख के आगे अंधेरा और गहरा हो गया
वक्त भी बहरा हुआ फिर दर्द भी चुप हो गए।
शब्द को आवाज मिलती फूंक से भी आपकी
आपसे उम्मीद थी तो आप भी चुप हो गए।
अपहरण कैसे हुआ अधिकार का, पूछा गया
पक्ष की तो बात क्या विपक्ष भी चुप हो गए।
बोलते थे जख्म जबतक गीत भी आता गया
गीत अब आता नहीं है जख्म भी चुप हो गए।
दर्श गज़लों में दिया क्यूं प्रश्न का उत्तर उन्हें
नाम लेते ही गज़ल का लोग भी चुप हो गए।
---30 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा ।
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