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कविता 17 / कोई कवि नहीं

कोई कवि नहीं
फुटपाथ पर चलता हुआ एक आदमी हूँ
बीचोबीच भागते वर्तमान का,
धुआं पी रहा हूँ
और धुआँ पीकर उगलना धुआँ
धूमपान है, कविता नहीं
कहते हैं वे  - मैं कवि नहीं और
कठिन समय मेंं और कठिन होता
कविता का होना,
काफी नहीं है कविता के लिए सिर्फ रोना
या सिर्फ विरोध, आक्रोश या गाली।
वाहवाही या ताली
सबूत नहीं इस बात का
कि सचमुच कविता हो रही है
या कुल्फी मेंं नोंक की ओर जाते जाते
आइसक्रीम की तरह कविता खो रही है
पता नहीं चलता

लेकिन कविता है मौलिक अधिकार
आत्मा के राज्य मेंं हरेक जिंदा मनुष्य का
और आलोचना है कर्तव्य वहां
हर त्रिनेत्रदर्शी  मनुष्य का
बिना इनके अराजक -अनिश्चित है
आत्मा का संविधान
और उसकी प्रस्तावना के सभी शब्द होंगे मुर्दे
क्योंकि वहाँ सवाल न रहेगा, न ही आपत्ति
और सिर्फ रोना कि समय कठिन है
और कठिन है कविता
और कहते हैं वे--
बदल नहीं पाएगा सूरज
या उससे  पिघलता, चूकर गिरता समय
जो दे रहा था धूप और उजाले का
अपरिमित,  झूठा एहसास
और उसे मैं  कर न महसूस
क्योंकि मैं कवि नहीं
मैं कवि का पुतला हूं
अंदर है सिर्फ घास- फूस।


-----27/05/2018, गोवा ।




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