ये सही है कि बहुत दूर हूं खेत - खलिहानों से।
मगर महसूसता हूं उन्हें चावल के नरम दानों से।
दाम देकर भी कभी कीमत चुका पाता नहीं
लाता हूँ घर जो भी , यहाँ राशन की दुकानों से।
गांव बनता है उजड़कर रोज मेरे ख्यालों में
आबाद है अब खूब वह खाली घर - मकानों से।
भर ख्वाब में आते मेरे, खेत मक्कों के वही
साग सरसों -सी महकती है वही सिरहानों से।
आएगी कब धूप-पानी उनके हिस्से की पूछ लो
धान की भी बालियां अब पूछती किसानों से।
अब रसोई से धुआं उठता नहीं , सीटी उठती है
भूख उठती है यहाँ अब पीठ के तहखानों से।
राह कोई तो बताएंगे यहाँ ये दौड़ती सड़कें
ये शहर आया था मैं सोच, बड़े अरमानों से।
02/05/2018
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