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गज़ल 25 / ये सही है कि


ये सही है कि बहुत दूर हूं  खेत -  खलिहानों से।
मगर महसूसता हूं उन्हें चावल के नरम दानों से।

दाम  देकर भी  कभी  कीमत  चुका  पाता नहीं
लाता हूँ घर जो भी , यहाँ राशन की  दुकानों से।

गांव  बनता  है  उजड़कर  रोज  मेरे ख्यालों में
आबाद है अब खूब वह खाली घर - मकानों से।

भर ख्वाब  में आते  मेरे,  खेत मक्कों  के वही
साग  सरसों -सी  महकती है वही सिरहानों से।

आएगी कब धूप-पानी उनके हिस्से की पूछ लो
धान की  भी  बालियां अब पूछती  किसानों से।

अब रसोई से धुआं उठता नहीं , सीटी उठती है
भूख उठती है  यहाँ अब  पीठ के  तहखानों से।

राह  कोई  तो बताएंगे  यहाँ  ये दौड़ती सड़कें
ये  शहर  आया था मैं  सोच,  बड़े अरमानों से।


02/05/2018

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