क्यों न आता इधर कोई आज उसकी छांव में। सोचकर ये मर रहा, बरगद अकेला गांव में।। बैठ छत पे फिर सुनाए रोज अंदेशा कोई ढूंढता हूं आज कौए , इस शहर की कांव में। ठंड रातों को अंगीठी , खाट के नीचे लगाए था पकाता ख्वाब को गरम - मीठी ताव में। फिर लगी थी होड़ इक आगे निकलने की या दिखे थे दौड़ में या तो फंसे थे दांव में। दूर कर देगी मुझे रफ्तार तेरी एक दिन चाहता जी बांध दूं पत्थर , तुम्हारे पांव में। एक पुल - सा जी रहा हूं, सोचता भी हूँ, नदी का थोड़ा - बहुत एहसास तो था नाव में। समय तो था साफ गंजा सिर हो सपाट जैसे उसपे उगाके बाल, मैं तो खो गया उलझाव में। 22 मार्च 2018 ...
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