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कविता 13 / मछुआ

मछुआ
मछली
मार रहा है

कछुआ
टांग
पसार रहा है

पछुआ
सबको
हांक रहा है

बछुआ
बीघा
आंक रहा है

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गज़ल 2/ एक जिंदा को

हर एक जिंदा को नशे में चूर देखा । मौत में सबको बहुत मजबूर देखा ।। ख्वाहिशों  के आसमाँ के, जमी में दफ्न  होने  का  वही  दस्तूर देखा । रिश्ते  करीब लगते हैं बस अंधेरे में उजाले मेें तो अपने भी,थे दूर,देखा । जिंदगी बेशक बहुत ही खूबसूरत है जब किसी ने जी इसे भरपूर देखा। खाक मेें  मिलती  नहीं    ये जिंदगी खाक में भी गर खुदा का नूर देखा। ------21 फरवरी 2018          वास्को दा गामा

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले

कविता / 34 / सुनो, कौशिकी !

     १. चला आया हूँ  दूर   तुमसे बहुत दूर लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें कभी भी भूला नहीं बस आ गई है  एक दूरी  - भर पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से बीच मेरे और तेरे बह रही अनवरत स्मृतियाँ उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है बिलकुल ताजा, साफ - शीतल रोज आ मैं थका - हारा नहाता हूं उसमें धोता हूं सभी कपड़े उतार उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में फिर उन्हें सुखाता हूं रोज नदी से बाहर आ वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं पकड़ वही कच्ची पगडंडियां निकल तपती रेत से जो छूट जातीं आगे कहीं जातीं खो किसी महामार्ग में शहर की ओर और फिर खो जाता हूँ आगे कहीं भीड़ में मैं भी एक सामान्य आदमी -सा और जहां से लौट आना बिलकुल होता है असंभव... लेकिन सच कहूं ऐ कौशिकी ! तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं कहीं तो खूब भीतर कोई अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे महसूस होता अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण जीवनी - शक्ति के टकराते ही रहते हैं मेरी उत्तप्त दीवारों से बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहत...