Skip to main content

कविता 15 / एक और निर्भया

अब है
बहुत जरूरी
एक बार ठीक से सर्जरी
मन की ।
मन
वैयक्तिक या सामूहिक
चेतन -अवचेतन
मगर रुको
इसके पहले बहुत -बहुत जरूरी है
समझना -देखना
ये ट्यूमर
विक्षिप्तता,  हवस,  ......
आदि नामों से
कहां -कहां घात लगाकर बैठा है
और फटता है अचानक
पता चलता है एकाएक
हुआ है ...बलात्कार ..
एक बच्ची का
मासूम बच्ची
पड़ी है अस्पताल में
लहुलुहान
गुमसुम-चुप, लुटी-पिटी
मृतवत्  अंदर,
और बाहर ?
बलात्कार ! बलात्कार  !
जहाँ देखो
दूरदर्शन, अखबार ...
सुबह -सुबह कामवाली बाई भी
घोर कलजुग
संवेदनशील प्राणियों की विरोध-सभा में हाहाकार
एकाएक हरकत में सरकार
घोर कलजुग
चौराहे पर,
चाय की दुकान पर भी
हरेक चुस्की के बाद..
बलात्......

इसलिए जरूरी है इस बार
अंतिम रूप से ढूंढना है
उस घोर कलजुग को
जिसमें रह रह टिमटिमाता है
वो ट्यूमर
जो बुद्धि को बना देता है भैंस
और विवेक को बैल
फिर नैतिकता की सारी नसें निचोड़कर
वो ट्यूमर
बनाता है मन को
विकृत , विक्षिप्त और नपुंसक
नैतिक रूप से बीमार
अर्थात्
बलात्कार करता है कोई कमजोर ही
जो भी कह लो उसे
राक्षस, नरपिशाच, वहशी या दरिंदा...
पर ध्यान रहे
उसके भी अंदर
खूब अंदर
एक आदमी है जिंदा
उसे बाहर लाना है जरूरी
अगर करनी है पूरी सर्जरी ...

और वह बच्ची
पतली धार नदी की
अभी बहना सीख रही थी
समय के साथ
पकड़कर हवा के हाथ
उड़ना सीख रही थी
एक नन्ही गौरैया
खिड़की पर बैठ
चुन -मुन से
किसी घर में डाल देती थी जान
रहना सीख रही थी...

...अभी सुधर रही हालत
जैसे जैसे शरीर की
मन में उभरता जाता कोई घाव
छाया - सी बनती है किसी मुंह -ढकी तस्वीर की
उसकी आँखों के सामने
आत्म - विश्वास की डूबती हुई नाव
घायल तितली अस्मिता की
छोटी -सी
सुरक्षा है
शरीर और आत्मा की कानून में
मगर भय है अभी भी
उसके खून में
और जब कभी उभरती है
बच्चियों -बेटियों के लिए
एकाएक विराट् सार्वजनिक दया
जरूर फिर हुई है
एक और निर्भया
आशंका होती है डर के साथ
फिर हुआ एक और
बलात् ...कार..

14 / 04 / 2018













Comments

Popular posts from this blog

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले

कविता / 34 / सुनो, कौशिकी !

     १. चला आया हूँ  दूर   तुमसे बहुत दूर लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें कभी भी भूला नहीं बस आ गई है  एक दूरी  - भर पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से बीच मेरे और तेरे बह रही अनवरत स्मृतियाँ उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है बिलकुल ताजा, साफ - शीतल रोज आ मैं थका - हारा नहाता हूं उसमें धोता हूं सभी कपड़े उतार उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में फिर उन्हें सुखाता हूं रोज नदी से बाहर आ वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं पकड़ वही कच्ची पगडंडियां निकल तपती रेत से जो छूट जातीं आगे कहीं जातीं खो किसी महामार्ग में शहर की ओर और फिर खो जाता हूँ आगे कहीं भीड़ में मैं भी एक सामान्य आदमी -सा और जहां से लौट आना बिलकुल होता है असंभव... लेकिन सच कहूं ऐ कौशिकी ! तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं कहीं तो खूब भीतर कोई अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे महसूस होता अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण जीवनी - शक्ति के टकराते ही रहते हैं मेरी उत्तप्त दीवारों से बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहत...

गज़ल 28 / तोड़कर दीवार भी

तोड़कर   दीवार    भी  तो  देखते। आ  जरा  इस पार  भी  तो  देखते।। ख्वाब  उतरेंगे  जमी  पर  एक  दिन होश  में  इक  बार  भी  तो  देखते। यूं नहीं कहते कि  दिल को रख बड़ा प्यार   का  आकार  भी  तो  देखते। गहन  भीतर  शांति  में  जब बैठ तू उमड़ता  यह  ज्वार भी  तो  देखते। ठूंठ   पर  चिड़ियां   बनातीं  घोंसले काल   की ये  मार  भी  तो  देखते। आंत का भूगोल  जब  भी  खींच तू भूख   का  विस्तार  भी  तो  देखते। लोग   टंगे    हैं    हवा   में   यूं  नहीं कौन   है   सरकार   भी  तो  देखते। दर्श  इतने  गीत - गजलें   क्या  करो जा   कहीं   बाज़ार  भी  तो  देखते। -----24 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा । 2122...