फर्क जो मालूम था क्या आग - पानी में ।
काम आया जिंदगी की बागवानी में ।।
थी हकीकत एक ही चारों तरफ पसरी हुई
देखी सभी ने है जमीनी - आसमानी में ।
पात्रता से बेदखल जब जिंदगी मेरी हुई
पात्र बनकर जी लिया झूठी कहानी में ।
मुर्दे पलों की ढेर पर सोता रहा सब दिन
जी सका न चार पल भी जिंदगानी में।
भाए उन्हें अपना चना सूखा भला क्यूं ?
चोंच जब से मारते चुपड़ी विरानी में।
रास्ता था दूर तक खाली, इधर कोई नहीं
मील का पत्थर अकेला था रवानी में ।
दर्श तुझको गजल कहनी आ गयी शायद
आने लगी है अदब, तेरी बदजुबानी में !
---------23 मई 2018
वास्को दा गामा, गोवा।
काम आया जिंदगी की बागवानी में ।।
थी हकीकत एक ही चारों तरफ पसरी हुई
देखी सभी ने है जमीनी - आसमानी में ।
पात्रता से बेदखल जब जिंदगी मेरी हुई
पात्र बनकर जी लिया झूठी कहानी में ।
मुर्दे पलों की ढेर पर सोता रहा सब दिन
जी सका न चार पल भी जिंदगानी में।
भाए उन्हें अपना चना सूखा भला क्यूं ?
चोंच जब से मारते चुपड़ी विरानी में।
रास्ता था दूर तक खाली, इधर कोई नहीं
मील का पत्थर अकेला था रवानी में ।
दर्श तुझको गजल कहनी आ गयी शायद
आने लगी है अदब, तेरी बदजुबानी में !
---------23 मई 2018
वास्को दा गामा, गोवा।
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