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मुद्दा नहीं है अंधेरा

मुद्दा अब अंधेरा नहीं कहीं नहीं है अंधेरा डूबता नहीं है सूरज अब कभी कहीं रात आती होगी शायद नींद में और शाम तो जैसे सदी का सबसे बड़ा झूठ अन्यथा हुआ ही रहता है सबेरा ...

खिलना भूल जाने के पहले

खिलना भूल जाने के पहले … ढूंढ़ो, ढूंढ़ो और ढूंढ़ो कहां हूं मैं अगर नहीं हूँ जमीन में, आकाश में पानी में, हवा - बतास में आग में या वहाँ  इडेन  के बाग में, पहाड़ में, जंगल क...

मुक्ति - पर्व

मुक्ति - पर्व जो फूल तोड़ते हैं वे तोड़ते हैं सपने मरोड़ते हैं संभावनाएं मारते हैं जीवन हत्यारे हैं वे मनुष्यता के असंख्य बीज के ! वे जानते हैं फिर भी तोड़ते हैं फूल ...

घर

घर मत पूछो कब लौटता हूं घर कोई उत्तर नहीं है मेरे पास लेकिन चलता हूं रोज घर की ओर सोचकर कि कभी तो पा जाऊंगा इस रास्ते का वह छोर जहाँ होगा मेरा घर खड़ा मेरी प्रतीक्षा ...

अपना अपना भाग

अपना – अपना भाग देख लिया हमने चुआकर पसीना, बहाकर खून आंसू पी – पीकर देख लिया हमने जीकर अलग-अलग व्यवस्था में बदली गई व्यवस्था हमारे नाम पर हमारे लिए बाद में व्यवस्था हमें बद...

क्रिसमस कविता

क्रिसमस कविता ---------------------- इलाका रेतीला और पथरीला चल रही होगी ठंढी हवा दिवस बंज़र रातें बांझ गुमसुम सुबह उतरने नहीं देती होगी कोई गीत किसी की आवाज़ में कहीं कोई चिड़िया - चुनमुन नह...

कविता / 34 / सुनो , कौशिकी !

     १. चला आया हूँ  दूर   तुमसे बहुत दूर लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें कभी भी भूला नहीं बस आ गई है  एक दूरी  - भर पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से बीच मेरे और तेरे बह रही अनवरत स्मृतियाँ उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है बिलकुल ताजा, साफ - शीतल रोज आ मैं थका - हारा नहाता हूं उसमें धोता हूं सभी कपड़े उतार उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में फिर उन्हें सुखाता हूं रोज नदी से बाहर आ वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं पकड़ वही कच्ची पगडंडियां निकल तपती रेत से जो छूट जातीं आगे कहीं जातीं खो किसी महामार्ग में शहर की ओर और फिर खो जाता हूँ आगे कहीं भीड़ में मैं भी एक सामान्य आदमी -सा और जहां से लौट आना बिलकुल होता है असंभव... लेकिन सच कहूं ऐ कौशिकी ! तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं कहीं तो खूब भीतर कोई अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे महसूस होता अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण जीवनी - शक्ति के टकराते ही रहते हैं मेरी उत्तप्त दीवारों से बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहत...

दीवार

दीवार के साथ जीने की सदियों लंबी आदत, परंपरा बन जाती है बिल्कुल दीवार - सी ही ठोस और खड़ी हमें जीना पड़ता है इन्हीं दो दीवारों के बीच हमेशा दीवार हमारे बीच रहती है  और हम दीवारों के बीच हम  हम तोड़े जाते हैं समय - समय पर  टूटते जाते हैं हम  दीवारें नहीं हम कुछ बरस जीते हैं  दीवारें जीती हैं सदियां, सहस्राब्दियां...

कविता / / दिन

वही पहला दिन था इस पृथ्वी का जब उठा था धुआँ  नीचे चूल्हे से घास - फूस की छप्पर के ऊपर और पकी थी पहली रोटी ! और दूसरा दिन ? वह आजतक आया नहीं  हां, घोषणा हुई अवश्य बार - बार कि अभी आ गया है वह सपनों में काग़ज़ों पर उतारना है उसे  फिर आना ही उसे जमीन पर आखिर कागजों से जमीन की दूरी ही क्या है ! ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है ! जमीन पर ही उगते हैं पेड़ पेड़ से बनते कागज कागज पर उतरते कुछ सपने सपनों में दिखता वह दिन  वह दिन उतरेगा इसी पृथ्वी पर ऐसी जल्दी या मजबूरी ही क्या है !

कविता / 33 / जीवन ऐसा ही रहता है !

आश्रय का झूठा आश्वासन जैसे एक जर्जर छप्पर टंगा रहता बोये गए सपनों के कूट - स्तंभों पर कभी नहीं बनता वह पक्की छत सिर्फ इसकी लालसा या आस  तनी रहती है आस - पास या सिर के ऊपर आजीवन बारिश हो या तेज हवा करीब - करीब असंभव होता है बचना और दोपहर को उसके अनगिन सूक्ष्म छिद्रों से जब धूप नीचे गिरती है तो छांह में भी छेद है, स्पष्ट दिखता है ! इसी को कोई नियति लिखता है या कोई कहता है ज्यादा सोचो मत, जीवन ऐसा ही रहता है ! ---08/08/2018

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले

कविता / 31 / कम हो जाता है शहर

जैसे मापा जा सकता है मनुष्य को भीतर से वैसे ही इस शहर को इसके ऊपर से ! इसलिए वह थकी चिड़िया बिजली - खंभे के हिलते तार पर सुस्ताती, उदास किंचित् भयभीत है । वह उदास है कि शहर का क्षेत्रफल जितना बढ़ता है रोज उतना ही कम हो जाता है शहर और सिकुड़ जाता है उतना ही यहाँ लोगों का भीतरी आयतन वह भयभीत है कि खो रही है रास्ते की लंबाई सड़कों की बढ़ती चौड़ाई में चौड़ाते नाले में परछाई बढ़ रही है नगरपालिका के सफाईकर्मियों की डूब रहा है शायद सूरज इस शहर का और इसलिए वह चिड़िया आशंकित उड़ गयी है पेड़ की तलाश में और रह गया है वहाँ हिलता वह बिजली - तार नंगा पूरे शहर को देने के लिए रोशनी की सांत्वना या आश्वासन  ! ----6 अगस्त  2018, गोवा।

गजल / 41 / खबर है सारे सितारे

खबर  है  सारे  सितारे  कल  जमीं  पर आएंगे। आसमां वे  लौटकर  वापस  नहीं  फिर जाएंगे।। आसमां में नफरतों की  आग कब की बुझ गई हम जमीवाले ,  न जाने , होश में  कब आएंगे। रोशनी की  आहटें  जो सुन  अभी - भी सो रहे वक्त पे  सूरज  कभी   पहचान  वे  क्या पाएंगे ? फूल पत्थर पे चढ़ा  हासिल हुआ है क्या कभी   फूल पर अब  पत्थरों को  हम चढ़ाकर आएंगे। जिंदगी -भर  खाक छानी  सोचकर ये ही सदा खाक से  निकले  हुए हैंं  खाक में मिल जाएंगे। 2122. 2122. 2122 . 212 1st August 2018.

गजल / 40 / आखिरी सीढ़ी पकड़

आखिरी  सीढ़ी पकड़  वो जो खड़ा है आदमी। देखता है  किस  तरह  छोटा - बड़ा है आदमी।। खाक से बाहर निकल वो आएगा वापस कभी ख्वाहिशों  की  कब्र  मेें  जिंदा  गड़ा है आदमी। फिक्र उनको है मकां  या बस्तियां खाली न हो देखता   कोई    नहीं    खाली  पड़ा है आदमी। ---31/07/2018, गोवा। 2122 2122 2122 212

गज़ल / 39 / कसक दिल में

कसक दिल में रह गयी थी जो  सदी से  शूल बनकर। आ  रही   बाहर  अभी   वह  खूबसूरत  फूल बनकर। इश्क  का  आईन  तो  था  एक  -सा  सबके  लिए ही सिर्फ  इंसां  ही  खड़ा  क्यों   कटघरे  में  भूल बनकर। सूंघकर   देखो   हवा  यह   लाएगी   तूफान  भी  क्या या  सदा  अफवाह   बस  आती   रहेगी   धूल बनकर। 'दर्श'   ऐसे    ही   नहीं  दरिया   रहा   बहता    हमेशा खूब  तूने  था   संभाला   अंत  तक   दो  कूल बनकर। 2122. 2122. 2122  2122

कविता / 30 / बोलना मत बाद में ।

बोलना मत बाद में कि बताई नहीं मैंने भी वह बात तुम्हें जो पहले कभी किसी ने कही नहीं कि अस्थि - कंकाल में रहती नहीं मुस्कुराहट कभी और इसलिए इतिहास कभी वह दे नहीं सकता तुम्हें जबकि मुस्कुराहट मनुष्य की सबसे बड़ी जरूरत है लेकिन इसे लाएं कहां से खींच यह तय करना या ढूंढना तुम्हें है क्योंकि पाना तुम्हें है इसलिए मैं बताऊंगा नहीं कि किधर जाना है या कि कितना दूर अन्यथा खोज नहीं शुरू होगा द्वंद्व या युद्ध एक दूसरे के विरुद्ध व्यक्तिगत या सामूहिक एक चुटकी मुस्कुराहट के लिए ! बोलना मत बाद में कि बताया नहीं मैंने कि बदल गई हैं बच्चों की स्कूली प्रार्थनाएँ उनके शब्द , उनकी पुकार , कामनाएं या अभीष्ट क्योंकि अब बदल गए हैं उनके ईष्ट नया है सिलेबस समय का बिल्कुल स्कूल यूनिफॉर्म , पानी का बोतल , यहाँ तक कि पानी भी नया मुझे पता है तुम्हारा समय गया इसलिये आश्चर्य न हो तुम्हें आनेवाले उस कल पर जो बिल्कुल भिन्न होगा आज से और मुझे पता है तुम उस कल में खोजोगे अपना सारा कल बीता हुआ अजनबी होकर रहोगे खड़े हर एक चौराहे पर अपना ही शहर - गांव पूछेगा तुम्हें  परिचय या पता और तुम अ...

गज़ल / 38 / तेज धूप है

तेज  धूप  है  ठंढी  क्यों है  इस पर बहुत  विवाद है। सूर्योदय यह  देखो  मौलिक  है  या बस अनुवाद है।। झंडे  लेकर अपने - अपने   चले  गये  वे  चोटी  पर अलग-अलग उन नामों पर  क्यों घाटी में उन्माद है ? दीवारों पर दर्ज अभी -भी  कल का सारा सन्नाटा है भूल  गए  तो पढ़ लो इसको, अच्छा  है गर  याद है। सुबह - सबेरे जिस मुर्गे ने बांग भरी थी देखो जाकर कितना वह कैदी है कितना सचमुच  वह आजाद है। उजड़े ख्वाबों की  दुनिया में  इक बस्ती  ऐसी भी है जहां अभी  भी हर  घर -आंगन रौशन है, आबाद है। ---------३०/०६/२०१८ ,  गोवा ।

गजल / 37 / तंग गलियों में कहीं

तंग गलियों में कहीं खोया हुआ - सा। शहर है  जैसे  यहाँ  सोया हुआ - सा।। कौन लाएगा खबर भी होश की देखो रुख सभी का नशे में धोया हुआ - सा। ख्वाब जैसे रेत बनकर  रह गया फिर आदमी है  ख्वाब में बोया हुआ - सा। खेत बंजर था पड़ा  सुनसान वीरां में एक पुतला था खड़ा रोया हुआ - सा। जिंदगी  देती  रही  कंधा  भरोसे  का  और रिश्ता भी रहा  ढोया हुआ - सा। ------०९/०७/२०१८ , गोवा।

कविता / 29 / सोचकर कुछ और

सोचकर कुछ और वह डाल देता है मुझे बार - बार गहरे कीचड़ में और मैं धंस जाता हूं रोज जैसे कोई दलदल में आकंठ। मुस्कुराता, वह चला जाता है वापस मुड़ - मुड़कर पीछे देखते हुए मुझे आगे कहीं थोड़ी देर बाद हो जाता है ओझल रह जाती है मेरी सूजती आंखों में उसकी आकृति धुंधली हवा में डोलती सिहर उठता है शरीर जकड़ा हुआ कीचड़ में अकड़ा हुआ आकंठ रात - भर... और सुबह वापस आकर वह देखता है आश्चर्यित आंखों से - मेरा मुखड़ा आज भी खिल गया है कीचड़ की गंदली सतह पर जैसे कोई ताजा कमल उसे नहीं मालूम  शायद रहस्य गंदले कीचड़ में है या या उसे आकंठ सहने में अन्यथा वह कभी नहीं डालता कीचड़ मुझपर और मैं नहीं धंसता कभी और न ही खिलता मैं कभी कमल बनकर भी और इसके लिए जब मैंने कहा -धन्यवाद वह भी कीचड़ में उतर आया साह्लाद !        ---०६/०७/२०१८

कविता / 28 / कुछ पता नहीं चलता

कुछ पता नहीं चलता कब सुबह हुई , दोपहर भी कब या कि शाम काम ही काम बस दिवस - भर...और दिवस बीत जाता है । कुछ पता नहीं चलता क्या गया भीतर कितना और कितना निकल गया कुछ इन आती-जाती सांसों के साथ यंत्रवत् जीवन - भर ...और हर एक पल लगता रीत जाता है । कुछ पता नहीं चलता अक्सर असत्य ही होता मज़बूत बहुत बार तो हारता है सत्य ही भले ही अंत में  एक बार जीत जाता है।  ----  ०३/०७/ २०१८