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कविता 3 / तुम चले गए

तुम चले  गए
रह गये यहीं ,
हल, खुरपी, कचिया
बैल, बकरिया, गैया, बछिया
पूस की गुदरी भोटिया - रतिया,
पुरबैया,
वर्षा के दिन भींगी अन्हरिया
बाँस,  बबूल,  बेर, कनेर
पास पुआल की ऊंची ढेर
भरी दूध की छोटी मटकी धरी रह गई
तुम चले गए पर
हाय! धरा यह हरी, रह गई ।

पर मुझको है विश्वास
तुम यहीं कहीं माटी में हो
हे माटी के अमर पुजारी
तुम चले गए चुपचाप 
तुमने सबको देखा
तू रहा सदा अनदेखा
सह धूप धूल संताप
पानी बनकर ज्यों उड़ा भाप
एकाएक
हे निष्पाप !
तुम चले गए

हे महाशुद्ध !
मैं तेरी हड्डी चुनता हूं
अस्थि-कलश ले जाऊँगा मैं
जहां -जहां  है थार सहारा
विराट् पसारा निर्जल बादल का
हे, पालनहारा !
सर्वत्र बहेगा तेरा
अश्रु -स्वेद बन अमृत - धारा ।

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