चारों तरफ रंगीन उजाला नज़र आता है;
मुझे तो सिर्फ घोटाला नज़र आता है ।
हँस रहे चूहे भी, अब बिरल्लीनुमा हँसी,
मुझे फिर दाल में काला नज़र आता है ।
दस्तखत को बेचते जो चंद सिक्कों पे,
ये कोई मंत्री का साला नज़र आता है ।
दे रहे हो 'दर्श' फिर दस्तक फिजूल क्यूं?
यहाँ तो हर द्वार पे, ताला नज़र आता है ।
मुझे तो सिर्फ घोटाला नज़र आता है ।
हँस रहे चूहे भी, अब बिरल्लीनुमा हँसी,
मुझे फिर दाल में काला नज़र आता है ।
दस्तखत को बेचते जो चंद सिक्कों पे,
ये कोई मंत्री का साला नज़र आता है ।
दे रहे हो 'दर्श' फिर दस्तक फिजूल क्यूं?
यहाँ तो हर द्वार पे, ताला नज़र आता है ।
Comments
Post a Comment