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कविता 4/ गुरु के प्रति

                     

गुरुवर, तेरे  चरण-तले मैं ,उठ-गिरकर शिशु-सा अनजान ;
सीख चुका हूं क्या होता है,जीवन -पथ का गति -विज्ञान ।

जब-जब  मेरे  निविड़ कंठ में,     गूंजेगा कल- गिरा- गान;
तेरी    स्मृति पर ही   होगा,   पहले   सुर  का अर्ध्य -दान।

जब-जब होगा,सफल पार्थ का ,जीवन -भेदी सर- संधान;
धर  देगा धनु, तूण- तीर सब , द्रोण-चरण यह, साभिमान।

जब-जब  मेरे  अंतर  की , प्राची में  कोई  चुपके   आकर ,
खो जाए फिर दूर  क्षितिज  में गहन लालिमा बिखराकर;

तब  - तब  मेरा पंछी  गाए,   तेरी  करुणा  के तरल गीत ;
बनी  रहे  तेरे चरणों  से, जनम - जनम   तक सरल प्रीत।

जब-जब   मेरे  अंतस्तल से,  फूटेगा   इक  आतुर  निर्झर;
उद्दाम  वेग में  उच्छेदित , जब होंगे  पथ के पाहन -प्रस्तर;

शक्ति  - सफलता  से  उत्साहित ,   मन मेरा न गर्वित   हो;
तेरा दिया समझ कर गुरुवर, सब कुछ तुझको अर्पित हो ।

                                      ------ दिलीप कुमार

कुछ पंक्तियाँ कॉलेज के दिनों की हैं,  कुछ पिछले सप्ताह लिखी थीं । उम्मीद है पसंद आएगी ।







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