गुरुवर, तेरे चरण-तले मैं ,उठ-गिरकर शिशु-सा अनजान ;
सीख चुका हूं क्या होता है,जीवन -पथ का गति -विज्ञान ।
जब-जब मेरे निविड़ कंठ में, गूंजेगा कल- गिरा- गान;
तेरी स्मृति पर ही होगा, पहले सुर का अर्ध्य -दान।
जब-जब होगा,सफल पार्थ का ,जीवन -भेदी सर- संधान;
धर देगा धनु, तूण- तीर सब , द्रोण-चरण यह, साभिमान।
जब-जब मेरे अंतर की , प्राची में कोई चुपके आकर ,
खो जाए फिर दूर क्षितिज में गहन लालिमा बिखराकर;
तब - तब मेरा पंछी गाए, तेरी करुणा के तरल गीत ;
बनी रहे तेरे चरणों से, जनम - जनम तक सरल प्रीत।
जब-जब मेरे अंतस्तल से, फूटेगा इक आतुर निर्झर;
उद्दाम वेग में उच्छेदित , जब होंगे पथ के पाहन -प्रस्तर;
शक्ति - सफलता से उत्साहित , मन मेरा न गर्वित हो;
तेरा दिया समझ कर गुरुवर, सब कुछ तुझको अर्पित हो ।
------ दिलीप कुमार
कुछ पंक्तियाँ कॉलेज के दिनों की हैं, कुछ पिछले सप्ताह लिखी थीं । उम्मीद है पसंद आएगी ।
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