सौ बार पहले स्वयं को मैं तोड़ता हूँ।
तब हथौड़ा और पर मैं छोड़ता हूँ।।
तोड़ना है इसलिए भी, बन सको तुम
क्या बनोगे मगर तुम पर छोड़ता हूँ।
जब कभी है तोड़ता, गजनी तुम्हें आके
आ तभी मैं तुम्हें फिर-फिर जोड़ता हूँ।
रुख तेरा बदला हमेशा जिस हवा ने
देख , कैसे रुख उसी का मोड़ता हूँ।
बन सको भी आदमी बेजान पत्थर से
दिन-रात अपना सर तभी तो फोड़ता हूँ।
दर्श लेकर आ नये अब बीज ताजा भी
आजकल मिट्टी नयी मैं कोड़ता हूँ।
----२४ / ०२ / २०१८ , गोवा ।
तब हथौड़ा और पर मैं छोड़ता हूँ।।
तोड़ना है इसलिए भी, बन सको तुम
क्या बनोगे मगर तुम पर छोड़ता हूँ।
जब कभी है तोड़ता, गजनी तुम्हें आके
आ तभी मैं तुम्हें फिर-फिर जोड़ता हूँ।
रुख तेरा बदला हमेशा जिस हवा ने
देख , कैसे रुख उसी का मोड़ता हूँ।
बन सको भी आदमी बेजान पत्थर से
दिन-रात अपना सर तभी तो फोड़ता हूँ।
दर्श लेकर आ नये अब बीज ताजा भी
आजकल मिट्टी नयी मैं कोड़ता हूँ।
----२४ / ०२ / २०१८ , गोवा ।
आपका एक अलग ही अंदाज़ लगा
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार आपका ।
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