कमजोर हूं, इसलिए मैं चोर हूं ।
बलवान हैं,इसलिए आप भगवान् हैं ।
जी, मुझे आती है चोरी की कला,
आपको आता है छोंपना गला।
गजनी से लेकर गाँधी की जेब,
तरह-तरह की काटी है मैंने, साहेब।
एक नहीं , पांच पेट का सवाल है,
फिर मेरा क्या? सबका ये हाल है।
कौन नहीं चाहता छप्पर की जगह छत?
जी, मुझे भी तो है आदमी बनने की लत।
वेद वाले दराज में जब बैठा है कीड़ा,
बुद्ध तो हूं नहीं कि समझूं मैं पीड़ा ।
सिक्कों मैं छपते रहे हैं आप,
मैं तो सिर्फ दस्तखत करता हूं साब ।
दूधिया रहे आपका कुर्ता -पाजामा,
कुछ भी करेगा ये आपका सुदामा।
सिक्ख, इसाई, हिंदू या मुसलमान,
सब तरफ तो आप ही हैं अम्लान।
पहले तो बम बनकर फटते हैं आप,
फिर ऊँ शांति शांति रटते हैं आप।
बंदूक की नोक पे विश्व को बांटते हैं,
देश का नक्शा फिर संसद में साटते हैं ।
दिल्ली की सांझ और लंदन का सबेरा,
सुरक्षित अक्षांश पर आपका है डेरा ।
आप ही तो हैं मानववाद का आखिरी अंडा,
भूखे पेट पर जो गाड़ते हैं झंडा ।
कभी गरीबी,जहालत तो कभी भ्रष्टाचार,
कुछ न कुछ हटाते ही रहे हैं आप लगातार ।
जनता को जीने का हक दे देते हैं,
रोटी-लंगोटी क्या, मकान तक दे देते हैं ।
कलम की नाक अपनी लताड़ से तोड़ते हैं,
बातें फिर दो -चार,मरहम की छेड़ते हैं ।
जहाँ जो मिले, सब खा जाते हैं,
फिर खबरों के मुखपृष्ठ पर छा जाते हैं ।
समझते नहीं दरअस्ल कुछ लोग बदतमीज,
कि बारुद भी होता है खाने की चीज।
तभी तो आपके विचार बारुदी होते हैं,
जनता रोती है और आप सोते हैं ।
मैं तो सिर्फ उन आँसुओं को पोंछता हूं,
फिर आपके ही बारे में सोचता हूं ।
--दिलीप कुमार
--फिर याद आई कॉलेज के दिनों की यह कविता ।
उम्मीद है, पसंद आएगी । सत्ताधारी राजनेताओं के
प्रति सरकारी नौकरशाही की खीझ, मजबूरी और
चाटुकारिता का काॅकटेल----
बलवान हैं,इसलिए आप भगवान् हैं ।
जी, मुझे आती है चोरी की कला,
आपको आता है छोंपना गला।
गजनी से लेकर गाँधी की जेब,
तरह-तरह की काटी है मैंने, साहेब।
एक नहीं , पांच पेट का सवाल है,
फिर मेरा क्या? सबका ये हाल है।
कौन नहीं चाहता छप्पर की जगह छत?
जी, मुझे भी तो है आदमी बनने की लत।
वेद वाले दराज में जब बैठा है कीड़ा,
बुद्ध तो हूं नहीं कि समझूं मैं पीड़ा ।
सिक्कों मैं छपते रहे हैं आप,
मैं तो सिर्फ दस्तखत करता हूं साब ।
दूधिया रहे आपका कुर्ता -पाजामा,
कुछ भी करेगा ये आपका सुदामा।
सिक्ख, इसाई, हिंदू या मुसलमान,
सब तरफ तो आप ही हैं अम्लान।
पहले तो बम बनकर फटते हैं आप,
फिर ऊँ शांति शांति रटते हैं आप।
बंदूक की नोक पे विश्व को बांटते हैं,
देश का नक्शा फिर संसद में साटते हैं ।
दिल्ली की सांझ और लंदन का सबेरा,
सुरक्षित अक्षांश पर आपका है डेरा ।
आप ही तो हैं मानववाद का आखिरी अंडा,
भूखे पेट पर जो गाड़ते हैं झंडा ।
कभी गरीबी,जहालत तो कभी भ्रष्टाचार,
कुछ न कुछ हटाते ही रहे हैं आप लगातार ।
जनता को जीने का हक दे देते हैं,
रोटी-लंगोटी क्या, मकान तक दे देते हैं ।
कलम की नाक अपनी लताड़ से तोड़ते हैं,
बातें फिर दो -चार,मरहम की छेड़ते हैं ।
जहाँ जो मिले, सब खा जाते हैं,
फिर खबरों के मुखपृष्ठ पर छा जाते हैं ।
समझते नहीं दरअस्ल कुछ लोग बदतमीज,
कि बारुद भी होता है खाने की चीज।
तभी तो आपके विचार बारुदी होते हैं,
जनता रोती है और आप सोते हैं ।
मैं तो सिर्फ उन आँसुओं को पोंछता हूं,
फिर आपके ही बारे में सोचता हूं ।
--दिलीप कुमार
--फिर याद आई कॉलेज के दिनों की यह कविता ।
उम्मीद है, पसंद आएगी । सत्ताधारी राजनेताओं के
प्रति सरकारी नौकरशाही की खीझ, मजबूरी और
चाटुकारिता का काॅकटेल----
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