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गज़ल 9/पूरी तरह जब मूल से

पूरी तरह  जब  मूल  से  उखड़ा हुआ हूँ।
महसूस  होता  ठूँठ -सा अकड़ा हुआ हूँ।।

बहुत खुश था कभी  रिश्तों के समुंदर में
रेत  पर  हूँ,   सभी   से  बिछड़ा हुआ हूँ।

तुम्हें  लगती  जिंदगी  मेरी सजी - संवरी
देख आके , किस कदर बिखरा हुआ हूँ।

जिंदगी यह हो गई है  एक  मैराथन यहाँ
दौड़ता हूं खूब, महसूसता ठहरा हुआ हूँ।

खो  गई   मेरी  जमी  आकाश   छूने  में ,
चोटियां भी  चढ़  बहुत  पिछड़ा हुआ हूँ।

रोज  नीचे   बह  रही  है  जिंदगी  गहरी
एक  पुल - सा  मैं  तना   ठहरा हुआ हूँ।

क्या करूं कोई शिकायत  भी जमाने से
अगर  खुद का ही  बना-बिगड़ा हुआ हूँ।


--------26 फरवरी 2018

           वास्को दा गामा , गोवा ।




--------26 फरवरी 2018
           वास्को दा गामा , गोवा ।



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