निद्रा के उर्वर बागों में
सपनों के डंठल पर हंसते
आशा के नव फूल खिले थे
कभी कल्पना - कोइल की थी
जिनमें स्वर-लहरी लहराई
जिनको चूमा मानस-भौंरा
था जो मेरा जीवन -सौंदर्य
कभी और जिनको सहलाया
आँखों का था पावन पावस
टूट गए वे बिखर गए
किसने ऐसी हवा उड़ाई।
सपनों के डंठल पर हंसते
आशा के नव फूल खिले थे
कभी कल्पना - कोइल की थी
जिनमें स्वर-लहरी लहराई
जिनको चूमा मानस-भौंरा
था जो मेरा जीवन -सौंदर्य
कभी और जिनको सहलाया
आँखों का था पावन पावस
टूट गए वे बिखर गए
किसने ऐसी हवा उड़ाई।
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