Skip to main content

गज़ल 10/ आज फिर से बादलों ने



आज  फिर  से  बादलों ने  इस  जमी की बात की।
जब  हवा  ने  दी  खबर,  गरमागरम   हालात की।।

जख्म  पे  चर्चा  चली  थी  देर   तक  चारों  तरफ
मगर मरहम की  किसी  ने भी  नहीं कुछ बात की।

घर- घर   उजाले -धूप का  जिम्मा लिया तूने मगर
लाया कहां सूरज कभी भी सिर्फ उसकी बात की ?

खेत  में  जाके  वहां  भी   पूछ   फसलों  से  कभी
क्यों किसानों  ने  हमेशा  खुदकुशी   की बात की।

आम लोगों से जुड़ा जब भी कभी  उछला  सवाल
बात  बनकर  रह गया  हर  बार  वो  जज्बात की।

बोझ  सीने  में  लिए  सब  खड़े  होकर हांफते  थे
जी  मेरा  हल्का  हुआ  जब  खूब  सबसे बात की।

खूब  आएगा  उजाला   कल   सुबह  सबके  लिए
ये  खबर  सुन  कौन  लेता भी खबर  इस रात की ?

खुल गया है  भेद  बादल !  तेरे   बरसने  का  सही
जमी   से  पानी  लिया  फिर जमी  पे  बरसात की।


        ----28 फरवरी 2018,

            वास्को दा गामा, गोवा ।
























Comments

Popular posts from this blog

कविता / 32 / यह बताना है अभी मुझे

मुझे मत बनाओ अतीत का अग्रज न ही भ्रूण भविष्य का मुझे रहने दो बस सहोदर वर्तमान का क्योंकि मुझे देखना है अभी और केवल अभी का जीवन और उसे जीना है अभी और अभी ही फिर अभी ही बताना है कि जीना ही बदलना है दरअसल बदलाव नहीं आते किसी किताब की कोख से न ही तर्क या झूठी उम्मीद की नाप - जोख से बदलता है जीवन ! न कल की वृष्टि - छाया पर रोने से न ही आगे मृग - मरीचिका के पीछे दौड़ने से जीवन बदलेगा सिर्फ अभी के क्षण से स्वयं को जोड़ने से । यह बताना है अभी मुझे सोने से पहले

कविता / 34 / सुनो, कौशिकी !

     १. चला आया हूँ  दूर   तुमसे बहुत दूर लेकिन छोड़ा नहीं है मैंने तुम्हें कभी भी भूला नहीं बस आ गई है  एक दूरी  - भर पर कभी वह रही नहीं शून्य बनकर वरन् सेतु बनकर एक , तनी हुई है सदा से बीच मेरे और तेरे बह रही अनवरत स्मृतियाँ उसके नीचे जैसे पानी अबाध बहता है बिलकुल ताजा, साफ - शीतल रोज आ मैं थका - हारा नहाता हूं उसमें धोता हूं सभी कपड़े उतार उस पर बरसती - नग्न चढ़ती धूप में फिर उन्हें सुखाता हूं रोज नदी से बाहर आ वे  कपड़े पहन वापस निकल पड़ता हूं पकड़ वही कच्ची पगडंडियां निकल तपती रेत से जो छूट जातीं आगे कहीं जातीं खो किसी महामार्ग में शहर की ओर और फिर खो जाता हूँ आगे कहीं भीड़ में मैं भी एक सामान्य आदमी -सा और जहां से लौट आना बिलकुल होता है असंभव... लेकिन सच कहूं ऐ कौशिकी ! तेरा पानी कभी भी सूखता नहीं कहीं तो खूब भीतर कोई अक्षय स्त्रोत - उद्गम तेरा हरा रहता है रोज चैतन्य जैसे महसूस होता अन्दर सदा प्रवहमान जल - कण जीवनी - शक्ति के टकराते ही रहते हैं मेरी उत्तप्त दीवारों से बनकर भाप मेरी सांसों में घुलते ही रहत...

गज़ल 28 / तोड़कर दीवार भी

तोड़कर   दीवार    भी  तो  देखते। आ  जरा  इस पार  भी  तो  देखते।। ख्वाब  उतरेंगे  जमी  पर  एक  दिन होश  में  इक  बार  भी  तो  देखते। यूं नहीं कहते कि  दिल को रख बड़ा प्यार   का  आकार  भी  तो  देखते। गहन  भीतर  शांति  में  जब बैठ तू उमड़ता  यह  ज्वार भी  तो  देखते। ठूंठ   पर  चिड़ियां   बनातीं  घोंसले काल   की ये  मार  भी  तो  देखते। आंत का भूगोल  जब  भी  खींच तू भूख   का  विस्तार  भी  तो  देखते। लोग   टंगे    हैं    हवा   में   यूं  नहीं कौन   है   सरकार   भी  तो  देखते। दर्श  इतने  गीत - गजलें   क्या  करो जा   कहीं   बाज़ार  भी  तो  देखते। -----24 मई 2018, वास्को दा गामा, गोवा । 2122...