एक दलदल में फंसा हूं इन दिनों। और भी लगता धंसा हूँ इन दिनों। । हो रहा चढ़ना - उतरना इस कदर महसूस होता है नशा हूं इन दिनों। चढ़ गया सिर कौन पागलपन मेरे बेवजह कितना हंसा हूं इन दिनों । रस्सियों -सी बांधती हैं कुछ मुझे महसूस होता है कसा हूं इन दिनों । दर्श मुझको ढूंढ मत बाहर कहीं देख रग - रग में बसा हूँ इन दिनों । -----३० मई २०१८ वास्को दा गामा, गोवा ।
गाओ नहीं, सुनो सुर मेें तो कविता आती है। ---दिलीप कुमार दर्श