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कविता 11 / आपत्ति है

आपत्ति है
कुछ मित्रों को
मुझपे नहीं , मेरे शब्दों पर
उनके मिज़ाज पर,
उनके निहितार्थ पर
शब्दों की सामयिकता
सामर्थ्य पर
आपत्ति
हो सकती है
होनी ही चाहिए
क्योंकि आपत्ति ही
जिंदा होने का सबसे बड़ा सबूत है
और वहीं से शुरू होती है
नये की संभावना
क्योंकि सहमति के आरामदेह वातानुकूलित कक्ष में
हृदय सिर्फ धड़कता है वक्ष में

आपत्ति ही क्यों ?
मित्रो ! संदेह भी करो
मुझपे नहीं , मेरे शब्दों पर
उनकी क्षमता पर
उनके ईमान , सत्य - निष्ठा पर
संदेह करो अवश्य
उनकी प्राण - प्रतिष्ठा पर
चरित्र पर भी
क्योंकि
संदेह के सूखे आकाश में ही
किसी दिन उमड़ेंगे
घनीभूत श्रद्घा के बादल
संदेह ही बताएगा
शब्दों में अर्थों के कितने चोर -दरवाजे हैं
या कि इनमें प्रजा कितनी है
कितने राजे -महाराजे हैं
संदेह ही बताएगा

फिर जरूरी है सवाल भी
मुझसे नहीं , मेरे शब्दों से
कविता से पूछो
अवश्य
लेकिन जवाब की गारंटी नहीं है
क्योंकि जवाब इतना आसान नहीं है
क्योंकि वास्तव में
कोई शाश्वत समाधान नहीं है
और सवाल भी हमेशा दरअसल वही नहीं है
और ये तो कविता है
ट्रीटमेंट पैकेज या टोना -टोटका नहीं
जीवित रखेगा हमें पानी, कोई वोडका नहीं
पानी
आत्मविश्वास का बढ़ता - बहता रहेगा
अहर्निश
अगर हम उत्तर ढूंढना रखेंगे जारी
कभी तो सवालों पर हम होंगे भारी
लेकिन पहले सवाल है जरूरी
मुझसे नहीं,  कविता से, ......

ये आपत्ति
संदेह
और सवाल
सूत्र हैं
संभावना , श्रद्घा एवं आत्मविश्वास  जगाने के लिए
क्योंकि सिर्फ धूप काफी नहीं है
नर्म घास उगाने के लिए

और यह कोई नयी बात नहीं
सूत्र पुराने ही सही
सुपरीक्षित हैं अगर नये को जन्म देने के लिए
फिर से आजमाओ
समय मत गंवाओ
अभी भी बहुत आगे जाना है
सूरज को वापस बुलाना है
फिर कहेंगे
'शुभ प्रभात' ।

       --सुधी पाठकों को समर्पित ।

------- 8 अप्रैल 2018
         वास्को दा गामा।





















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