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कविता 10 / पहली बार

ये ......तंत्र है
जो भी लगा लो इसके पहले
प्रजा, लोक,  भीड़  .....वगैरह वगैरह
वो इसके ठीक पीछे चलता है
बिल्कुल डब्बे जैसे पीछे
और रेल की इंजन आती है
बाद में
लेकिन चलती है आगे आगे
धड़-धड़-धड़म-धुड़ुम-धड़ाम........

इसे सपाटबयानी समझो
या कि कविता
कोई फर्क नहीं
क्योंकि सच्चाई यही है
और इसे कहने में
सिर्फ कविता ही समर्थ है।

क्योंकि ये तंत्र है
इसे लोको पायलट दौड़ाता है
पहले से तयशुदा पटरियों पर
देश को आगे
ले जाना है
बहुत आगे...
पीछे डिब्बे में बिठाकर
लोग
एक सौ पच्चीस करोड़
नवजात शिशुओं को मिलाकर
सिर्फ उन्हें मत गिनो
जो पैदा नहीं हुए
लेकिन पेट में हैं
और जिनका आधार कार्ड नहीं है
लेकिन डिब्बे में वे भी हैं
क्योंकि देश का दूर भविष्य हैं वे भी
ले जाना है आगे सबको
विकास, सतत विकास
...सब्सिडी बांटनी है
चावल दाल और आटा भी
ध्यान रहे अगले मार्च तक
कम करना है राजकोषीय घाटा भी
कर भी बढ़ाने हैं शनै: शनैः
उगाही की पुरानी पाइपलाइन को
लीकेज प्रूफ भी बनाना है
क्योंकि घर घर सबेरा जो पहुंचाना है
हरेक आदमी जिंदा या मुर्दा
अपने पैरों पर खड़ा होगा पहली बार
रोजगार नहीं स्वरोजगार
पहली बार अंतिम आदमी भी  बनेगा
जी डी पी की नायाब इकाई
फिर आसमान से
चुपचाप
अपने आप
हल्लू से नीचे उतरेगी महंगाई
और नीचे ही रहेगी
अगले चुनाव तक।

पहली बार
भ्रष्टाचार पर कसेगी नकेल
भ्रष्ट जाएंगे जेल
कोई पूर्वाग्रह नहीं ना ही पक्षपात
पूरी वस्तुनिष्ठता से होगा कुठाराघात
और भारत माता की साड़ी
बापू की धोती
कश्मीर से कन्याकुमारी
पोरबंदर से अरुणाचल तक
होगी बेदाग
धोबी का दावा है
और साबुन में इस बार झाग नहीं
लावा है
पहली बार
स्वच्छ होगा देश

और ये जो चुनाव है
हरेक पांच साल की दूरी पर स्थापित
समझो एक टीसन है
रुकना है फिर दौड़ाना है
लोको पायलट कोई भी हो
उसी पटरी पर
दौड़ते हुए
तय करनी है
अनाज के दाम की न्यूनतम सीमा
किसानों की
उनकी फसलों का बीमा
सुनिश्चित करना है
खुदकुशी मुक्त भारत
धीरज रखो
अगले चुनाव तक
पेट की भूख से ज्यादा महसूस होगी
भूख पीठ की
उन्हें बहुत चिंता है
इस रेल की स्पीड की.....




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