ठोकरें खाके भी फिर से संभलना सीखा ।
अपने पैरों पे अब मैंने भी चलना सीखा ।।
बनके पत्थर तो हासिल कुछ भी न हुआ
बर्फ बनके ही सही लेकिन गलना सीखा ।
कैसे कह दूं, कोई खूबी नहीं पड़ोसी में
उनकी खूबी पे उनसे ही जलना सीखा।
सुबह होगी, मेरे जाने पे, यकीं है मुझको
मैंने सूरज से नहीं, रातों से ढलना सीखा ।
मेरे पैरों की निशानी न मिलेगी उनको
मैंने रेतों पे माथे के बल , चलना सीखा ।
तूने पेड़ों पे उछाले हैं पत्थर इतने
लो, इन्होंने भी पत्थर ही फलना सीखा ।
उनके खारे समुंदर का डर नहीं कुछ भी
उनकी पलकों में पानी पे पलना सीखा ।
------दिलीप कुमार दर्श
अपने पैरों पे अब मैंने भी चलना सीखा ।।
बनके पत्थर तो हासिल कुछ भी न हुआ
बर्फ बनके ही सही लेकिन गलना सीखा ।
कैसे कह दूं, कोई खूबी नहीं पड़ोसी में
उनकी खूबी पे उनसे ही जलना सीखा।
सुबह होगी, मेरे जाने पे, यकीं है मुझको
मैंने सूरज से नहीं, रातों से ढलना सीखा ।
मेरे पैरों की निशानी न मिलेगी उनको
मैंने रेतों पे माथे के बल , चलना सीखा ।
तूने पेड़ों पे उछाले हैं पत्थर इतने
लो, इन्होंने भी पत्थर ही फलना सीखा ।
उनके खारे समुंदर का डर नहीं कुछ भी
उनकी पलकों में पानी पे पलना सीखा ।
------दिलीप कुमार दर्श
16 अप्रैल 2018
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http://merihindirachna.blogspot.in
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