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गज़ल 24 / महफिलें अब न लगा


महफिलें अब न लगा, गुल न खिलाओ गज़लों में।
आ जरा सड़कों से अब आंखें मिलाओ गज़लों में।।

पानी अभी भी  पीने  का  है  नहीं  मयस्सर जिन्हें
उनको बुला भी आह भर पानी पिलाओ गज़लों में।

पेड़ तो  है   रोटियों  का ,  छांह में  वे   भूखे  बैठे
जरा  इसकी डाल भी आके    हिलाओ गज़लों में।

बेचना चाहो अगर कुछ बिकता ही है बाज़ार में वो
बेचना खुद को अगर तो आंसू  मिलाओ गज़लों में।

ओढ़कर ख्वाबों को  वे तो  सो  रहे  हैं सदियों  से
भूख  गर  सोती  नहीं  तो  मत सुलाओ गज़लों में।

कंधे हजारों  बेबसी के हैं टिके वे देख  कंधे से तेरे
वाह सुनकर भी कभी न, कंधे  भुलाओ गज़लों में।

वही   चादर  है  बनानी   गर  नये  धागे   से  फिर
कोई  नया  भी  हो  रफूगर  तो  बुलाओ गज़लों में।

आज तक वे ला न पाए  चांद को अपनी जमी पर
आएगा  वो  आज गर दिल  से  बुलाओ गज़लों में।

----पुनर्संशोधित / २९ मई २०१८





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