बांधकर खींचती हो अपनी ओर, कविता !
बहुत मजबूत है तेरी यह डोर, कविता !!
खींचना जितना तुम्हें है , खींच ले मुझको,
लकीर हूं ऐसी कि है न कहीं छोर, कविता !
तेरी हस्ती का एहतराम जो किया हरदम
तुम समझते रहे , मैं हूं कमजोर, कविता !
जो भी सुनाता हूँ मैं , सबके घर-घर जाके
तेरे सीने से ही चुराया हूं वो शोर, कविता!
अपनी मुट्ठी से निकालो भी सूरज अब तो
बंद कबतक खयालों में रहे भोर, कविता!
स्वरचित, 11 अप्रैल 2018 ।
बहुत मजबूत है तेरी यह डोर, कविता !!
खींचना जितना तुम्हें है , खींच ले मुझको,
लकीर हूं ऐसी कि है न कहीं छोर, कविता !
तेरी हस्ती का एहतराम जो किया हरदम
तुम समझते रहे , मैं हूं कमजोर, कविता !
जो भी सुनाता हूँ मैं , सबके घर-घर जाके
तेरे सीने से ही चुराया हूं वो शोर, कविता!
अपनी मुट्ठी से निकालो भी सूरज अब तो
बंद कबतक खयालों में रहे भोर, कविता!
स्वरचित, 11 अप्रैल 2018 ।
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