बात भी ऐसी कि खुद निकलती नहीं है।
मेरी भी जुबां अब तो फिसलती नहीं है।।
वे भी चुप हैं ,मेरी चुप्पी की वज़ह सुनकर
आग ठंडी है अभी, पीर उबलती नहीं है।
धूप तो आके गई है बहुत बार ही लेकिन
ये बर्फ ही ऐसी है कि पिघलती नहीं है।
कहो तो उंगली से ही चिनगारी लिख दूं
कलम मेरी भी अब आग उगलती नहीं है।
सबके सीने में इक लौ तो दिखती है यारो
बहुत जलती है वो लेकिन मचलती नहीं है।
बूंद - बूंद बनके, कितना ढोया हूं तुमको
ऐ समुंदर !अब तेरी हस्ती संभलती नहीं है।
लौटकर जाएंगे वे भी खाली , यहाँ से
तेरे गीतों से मेरी गज़ल भी बहलती नहीं है।
--------10 अप्रैल 2018,
वास्को दा गामा, गोवा ।
मेरी भी जुबां अब तो फिसलती नहीं है।।
वे भी चुप हैं ,मेरी चुप्पी की वज़ह सुनकर
आग ठंडी है अभी, पीर उबलती नहीं है।
धूप तो आके गई है बहुत बार ही लेकिन
ये बर्फ ही ऐसी है कि पिघलती नहीं है।
कहो तो उंगली से ही चिनगारी लिख दूं
कलम मेरी भी अब आग उगलती नहीं है।
सबके सीने में इक लौ तो दिखती है यारो
बहुत जलती है वो लेकिन मचलती नहीं है।
बूंद - बूंद बनके, कितना ढोया हूं तुमको
ऐ समुंदर !अब तेरी हस्ती संभलती नहीं है।
लौटकर जाएंगे वे भी खाली , यहाँ से
तेरे गीतों से मेरी गज़ल भी बहलती नहीं है।
--------10 अप्रैल 2018,
वास्को दा गामा, गोवा ।
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