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कविता 8 / बांटो मत

बांटो मत
मुझे
बांएं और दाएं में
मैं कोई सड़क नहीं
बांटो मत
मुझे
आगे और पीछे में
मैं कोई जुलूस नहीं
बांटो मत
मुझे
पूरब में पश्चिम में
मैं कोई आकाश नहीं
बांटो मत मुझे
न ही गाय में सुअर में
मैं कोई जानवर नहीं
हांक दो या दबा दो दांत में
दो भूखे जबड़ों के बीच
बांटो मत
या किन्हीं  खटालों में
क्योंकि ये सड़क व जुलूस से लेकर
जानवर तक
और जो भी विभाजक हैं
सब तुम्हारे आविष्कार हैं
या फ़िर वे तुम्हारे अहंकार हैंं
कि सिर्फ वे ही सही हैं
और चलता हुआ आदमी गलत
क्योंकि
सुनो
अब मैं समझ गया हूँ
कि मैं इस पृथ्वी की जीवित मिट्टी हूँ
अदद
जिसके भीतर
खूब भीतर
एक चट्टान है
हमेशा जवान तरोताज़ा
तरल भी रज-वीर्य -सा
अखंड
भीतर
मत समझना इसलिये
मैं अलग हूं
उन अनन्त अनन्त
दूर अति दूर
गोल -अगोल
पिंडों -महापिंडों से
ब्रह्मांड के।

इसलिये भूल दुहरा नहीं !
क्योंकि इस भूल की सजा
तुम्हें मिली नहीं कभी
मिली है मुझे ही बार -बार
बंटना पड़ा
कटना पड़ा
टुकड़ों-पुर्जों में
मुझे ही बार -बार बेवजह
क्यों ??
तुम्हारे बेजान दर्शन -वाद-सिद्धांत ने
ली है कितनी जान !
कितनी बार मुझे
मुर्दा या गलत ठहराया गया
इन्हे जीवित रखने
या सही ठहराने के लिये।
और तुम्हारा झंडा फहराने के लिए
मेरा सर ही खुदा क्यों बार-बार ?

लेकिन
अब मैं समझ गया हूँ
सीधा - साफ
क्योंकि मैं एक जवान आदमी हूँ
सोच का आधुनिकतम वर्जन
अधिकतम क्षमता के सी पी यू से लैस
जिंदा कम्प्यूटर
बिल्कुल वस्तुनिष्ठ विचार - प्रक्रिया
आग्रह -पूर्वाग्रह से अस्पृष्ट
लेकिन हृदय से व्यक्ति- निष्ठ
तरल मूल्यों का स्वामी,
मुझे बांटो मत,
दिल और दिमाग के बीच
बस सुरक्षित दूरी पर रखो दोनों को अलग
लेकिन एक ही इकाई मेें
जो नितांत मेरी है
किसी की जागीर नहीं
कोई भी मेरा पीर नहीं
बांटो मत
सबको बुलाओ
मंच भी बनाओ मत
भीड़ में खड़े हो
कोई घोषणा-पत्र नहीं
ना झंडा न एजेंडा
और उद्घोष कर दो.......
'हम एक हैं
और हमारी नियति भी'।

------2 अप्रैल  2018
       वास्को दा गामा, गोवा ।













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