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कविता 9 / ऊपर से आह्वान है

रोको
इसे रोको
इधर ही आ रही है
हंगामेदार शोर
सुनामी-सा उठता हुआ
शोर को  चीरकर लगातार
स्पष्ट  होते नारे
.........जिंदाबाद ........मुर्दाबाद
....... खतम करो,  खतम करो ..
........मंजूर नहीं , मंजूर नहीं
.......पूरी हों,  पूरी हों ...
अपने -अपने हथियार
अपनी- अपनी पसंद के
लाठी-डंडे
डीजल पेट्रोल
कीचड़ कालिख टमाटर अंडे
तोड़- फोड़,
अपने अपने आक्रोश के हिसाब से
इधर ही आ रही है
सड़क को जैसे दबाती-दबोचती
उमड़ती भीड़
इधर ही आ रही है।

कौन लोग हैं ये ?
इतना आक्रोश ?
ये क्या ?
मूर्ति तोड़ दी ?
बीच चौराहे पर
पुलिस बेबस , मूकदर्शक,  निर्वाक्
इतनी नफरत ?
कि नीचे गिरे टुकड़ों पर
कालिख पोत रहे हैं ?
ये तो तय है
यह कोई महापुरूष था
लेकिन इस भीड़ का नहीं था
पहचान की अपनी कसौटी के मुताबिक
सालों पहले कभी इतिहास में
इस पुरूष ने
कुछ कहा - किया था ऐसा
भीड़ को लगा
आज अभी
सही मौका है
पुराने हिसाब चुकाने का
सही समय है सबको बताने का
कि लोकतंत्र में
विरोध सामूहिक प्रतिशोध का भी एक नाम है ।
अरे ! ये क्या ?
वह नौजवान बोतल खोल
खुद पर डाल रहा पेट्रोल
बोला - ' आत्मदाह '
जबरदस्त उछाह
नारे चढ़े फिर परवान लगातार
भीड़ चिल्लाती है - शहादत ..खून...
और वह नौजवान
पूरी भीड़ के लिए अकेले मरना चाहता है
आज अभी
सबके लिए कुछ करना चाहता है
एक बूढ़ी औरत ?
इसे भगाओ..मत आने दो इधर
यह उसकी माँ है -
छोड़ो मेरे बेटे को ...
क्यों मरेगा मेरा लाल ?
मरेगा एक
बांकी सब उड़ाएंगे माल...
और बुढ़ापे की लाठी खोकर खाएगी
दर - दर की ठोकर
बाद में
बाकियों के मजे
इधर मुआवजे ...

लेकिन
ऊपर से आह्वान है
भारत बंद
ये ऐसे नहीं होगा
पहले चक्का जाम करो
इसीपे दौड़ता है आजकल भारत
तोड़ो शीशे दुकान के माॅल के
स्क्रीन सिनेमा हॉल के
इन्हीं से झांकता है भारत
और ढूंढो कहां - कहां हो सकता है
स्कूल अस्पताल वाचनालय में
दुबकके बैठा भारत
बंद करो उसे वहीं -वहीं
ऊपर से आह्वान है
एक भी एम्बुलेंस पहुंचने न पाए अस्पताल
न ही बच्चे स्कूल या कॉलेज
न ही हरी सब्जी मछली दूध...
बाजार मंडियों तक
पहुंचने न पाए ग्राहक रंडियों तक
ऊपर से आह्वान है
खोजो उसे
उपनिषद्, रामायण, गीता... में
पुरुष-सूक्त, मनुस्मृति में तो जरूर मिलेगा
वहां पंक्तियों में नहीं तो
पंक्तियों के बीच खोजो
क्योंकि 
जो खोजोगे मिलेगा वही 
इसलिए ठीक से खोजो 
भारत को
ऊपर से आह्वान है
उसे बंद रखो ग्रंथों -गुटिकाओं में
अन्यथा बेहतर है
कर लो आत्मदाह
ऊपर से आह्वान है
लेकिन
यहां  इस बार उसकी मां है
सामने खड़ी मोम
कोई समझाओ इसे
समय बदल गया है
दिल से नहीं
काम लो दिमाग से
बेमतलब मत खेलो
भरी जवानी में आग से
मत देखो इतिहास के कन्फ्यूड पन्ने
आका की नजरों से
मत चूसो
दूसरों के चूसे हुए गन्ने
और भी तरीके हैं अपनी भीड़ हेतु
कुछ करने के
अगर जवानी बचा सको
ढूंढो तरीक़े
उस भारत को नहीं
अक्सर जिसे ढूंढने में झोंक दिया गया है तुम्हें
और जिसे तुम्हें करने कहा गया है
बंद।
-----------कुछ और पंक्तियां भी जुड़ सकती हैं बाद में ।
तबतक के लिए सुधी पाठकों को समर्पित ।


















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