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कविता 7 / ऐ कबूतरो !

ऐ कबूतरो !
पहले जरा
नीचे दर्द में उतरो,
फिर तेरी हरेक गूंटर-गूं
बनेगी एक अदद कविता ।

ऐ कुत्तो !
मत चौंको,
बेवजह मत भौंको
आधी निःशब्द
रात को
सो रहा है सामाजिक प्राणी,
सही समय भांप
भौंको साक्रोश तो होगी दर्ज
एक और कविता ।
फिर सभी पढ़ेंगे उसे,
सभी जगह चर्चा होगी
पुस्तकें छपेंगी उसपे
फिर उन्हें सब पढ़ेंगे
अर्थ ढूंढेंगे
अपनी अपनी सुविधा
या स्वाद के मुताबिक
जुगाली करेंगे या
थूकेंगे
फिर कहेंगे
मिल गयी कालजयी कविता
जिसे ढूंढ रहे थे हम
सड़क, गली, मुहल्ले में
खेत-खलिहानों, पगडंडियों में
फिल्म,  फेसबुक, ट्विटर पे
गूगल या अखबारी मंडियों में
विज्ञापनों मेें
यहाँ तक कि क्रिकेट के बल्ले में..........
नित नये उपमान
बिम्ब या नयी
अभिव्यंजना -शैली की खोज में
आखिर मिल ही गई
एक कालजयी कविता
कहेंगे लोग
फिर भूल ही जाएंगे
तुम कबूतरों को कुत्तों को
सिर्फ गूंटर-गूं और भौंक ही बचेगी
नीचे
ऊपर रहेगा लिखा
एक कालजयी कविता।
............
और तुम हाशिये पर
कालबाह्य
काल-विजित या कवलित
जो भी कह लो।













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