अब नहीं सुनी जाएगी कोई प्रार्थना कल ही हुई है घोषणा आकाश में कुपित सूरज लाल दिन भर कहता रहा जागकर तारे भी भाग - भागकर चांद सारी रात ... अब नहीं सुनी जाएगी प्रार्थना क्यों न हो गीली कितनी भी शब्द भी हों मुखर कितने ही या लिए हों बूंद - बूंद भाव करुण - आर्द्र प्रवाह कितना भी हो उसमें हाहाकार अंतस का या सांस को बिंधती कोई लंबी कराह क्यों न हो बड़ा सा दैन्य या शून्य आँखों में मौन भी हो क्यों न गहरा या प्रगाढ़ प्रार्थनाओं में या हो आँसुओं की बाढ़ कोई फर्क नहीं अब रहेगा नीला आकाश सूखा ही सदा क्योंकि सुनी नहीं जाएगी प्रार्थना कल यही घोषणा हुई है। इसलिए अब आज से होगी इसी पृथ्वी को संबोधित प्रार्थना हर एक होकर नतमस्तक या दंडवत... रहेंगे सब मौन या चुपचाप और स्वीकार हो जाएगी हरेक प्रार्थना जिसे आज तक उठना या उड़ाना पड़ता था हमेशा ऊपर ऊंचा बादलों के पार ऊपर खिंचती जाती थी सारी डोर टकटकी लगाए सभी देखते थे ऊपर की ओर बिछौने पर चित- लेटा हाथ - पैर फेंकता एक नन्हा शिशु भी जैसे छत की ओर... सबके पैरों या जड़ों के नीचे धरती के भीतर क्योंकि सदा एक स्त्री ब...
गाओ नहीं, सुनो सुर मेें तो कविता आती है। ---दिलीप कुमार दर्श