आसमां में झाग बाक़ी ।
है जमीं पर दाग बाक़ी ।।
आंख का पानी संभालो
और भी है आग बाक़ी ।
कैद मत कर ये बहारें
और भी है बाग बाक़ी ।
फक्त रोटी खा रहे वे
है बची क्या साग बाक़ी ?
गुणा खुशियों का हुआ
अब दर्द का है भाग बाक़ी ।
'दर्श' गाता है उसे जो
अनछुआ है राग बाक़ी ।
है जमीं पर दाग बाक़ी ।।
आंख का पानी संभालो
और भी है आग बाक़ी ।
कैद मत कर ये बहारें
और भी है बाग बाक़ी ।
फक्त रोटी खा रहे वे
है बची क्या साग बाक़ी ?
गुणा खुशियों का हुआ
अब दर्द का है भाग बाक़ी ।
'दर्श' गाता है उसे जो
अनछुआ है राग बाक़ी ।
यह कविता उन दिनो की है जब मैं भागलपुर में रहता था।
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